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वार्षिकोत्सव - "Annual Function" short essay in hindi?

सामाजिक जीवन में जितना महत्व किसी त्यौहार का होता है उतना ही महत्व किसी विधालय के लिए वार्षिक उत्सव का होता है ! विधालय में प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला वार्षिक उत्सव उस शिक्षण संस्था की उन्नति और प्रगति का परिचय भी देता है ! इसमें साल भर विधालय में हुई शैक्षणिक गतिविधियों का सार होता है ! यह प्रत्येक विधालय में किसी निश्चित तिथि को मनाया जाता है ! विधालय में शिक्षक और छात्र दोनों ही वर्ग इस अवसर का साल भर बेसब्री से इंतज़ार करते रहते है और किसी महत्वपूर्ण त्यौहार की तरह इसकी तैयारियां महीने भर पहले से ही शुरू हो जाती है.हमारे विधालय का वार्षिक उत्सव भी प्रतिवर्ष 15 जनवरी को मनाया जाता है ! शारीरिक क्रीडाओ और परेड में हिस्सा लेने वाले छात्र लगभग एक महीने पूर्व से ही इसकी तैयारी करने लगते है ! इसी प्रकार सांस्क्रतिक नृत्य और संगीत गायन का अभ्यास भी कई दिनों पूर्व से ही आरम्भ कर दिया जाता है ! विधालय के छात्र से लेकर प्रधानाचार्य तक इस उत्सव की तैयारी में जुट जाते है.

आखिर लम्बे इंतज़ार के बाद 15 जनवरी का वह दिन भी आ ही गया जिसका छात्रों को एक साल से इंतज़ार था ! इस दिन विधालय का सम्पूर्ण भवन किसी दुल्हन की तरह फूल और मालाओ से सजा दिया जाता है ! स्कूल के सभागार में मुख्य अतिथि और अन्य शिक्षा अधिकारियो के बैठक की व्यवस्था समुचित रूप से की जाती है ! साथ ही छात्र और उनके अभिभावकों के बैठने को अलग से कुर्सिया लगा दी जाती है ! विचार-विमर्श कर 9 बजे झंडारोहन के बाद कार्यक्रम की शुरुआत होना तय किया गया.
निश्चित समय पर मुख्य अतिथि शिक्षा मंत्री महोदय पधारे ! कुछ छात्र उन्हें सम्मान से मुख्य द्वार से अतिथि कक्ष तक लाये ! विधालय की कुछ छात्राओ ने उनके सम्मान में सुन्दर रंगोलिया बनाई और मुख्य अतिथि होने के नाते आते ही उन्हें तिलक भी लगाया गया ! इन्हें स्कूल के बैंड की धुनों से सलामी दी गयी ! एनसीसी कैडेट ने परेड से उन्हें सलामी दी ! स्कूल के प्रधानाध्यापक ने माला पहना कर उनका स्वागत किया ! इसके बाद सरस्वती वंदना और गणेश वंदना के साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत हुई ! दहेज़ की बुराई को दर्शाने वाला एक नाटक भी दिखाया गया ! एक अन्य नाटक देश प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देने की भावना पर आधारित था ! इसके मध्य में स्कूल प्रबन्धन द्वारा विधालय का पिछले वर्ष का ब्यौरा भी रखा गया ! कई शिक्षको को भी बारी-बारी से बुलाकर पुरुस्कृत किया गया ! हमारे विधालय के शाला प्रधान ने भी अपने दो शब्द कहे.
इसके बाद नृत्य और संगीत के कार्यक्रम का आरम्भ हुआ ! इसमें कुछ बच्चो की मेहनत और अभ्यास ने ऐसा समां बंधा की दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए ! हास्य कवि सम्मलेन के माध्यम से कई बाल कवियों ने सामाजिक विषमताओ पर अपनी व्यंग्य रचनाये भी सुनाई जिसे सुन-सुनकर श्रोताओ के पेट में दर्द हो उठा ! कार्यक्रमों की इस श्रंखला में शाम के चार कब बज गए इसका पता ही नहीं चला ! इसके बाद लम्बी और ऊँची कूद की प्रतियोगिता हुई ! कई छात्रों ने पिरामिड भी बनाकर दिखाये.
कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि शिक्षा मंत्री जी ने विधालय की प्रबंधन समिति, शाला प्रधान और साथ ही विधालय के छात्र-छात्राओ की भी प्रशंसा की ! उन्होंने यह कहते हुई शाला प्रधान को बधाई दी की आपका विधालय तो प्रतिभा का खजाना है ! इसके बाद शिक्षा मंत्री द्वारा दसवी और बारहवी की शीर्ष वरीयता में आने वाले छात्रों को पुरूस्कार दिए गए ! शिक्षा मंत्री ने विधालय के हित में कई घोषणाये भी की ! सबसे ज्यादा उपस्थिति और आज के कार्यक्रमों की उत्कृष्टता के आधार पर कुछ अन्य अध्यापको द्वारा भी छात्रों को कई मैडल वितरित किये गए ! साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में विशेष परिणाम प्राप्त करने वाले अध्यापको को भी विषय के हिसाब से पुरुस्कृत किया गया ! इसमें कई समाज सेवी और वरिष्ठ गणमान्य नागरिक भी पधारे हुए थे ! इसके बाद राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का कार्यक्रम भी हुआ जिसने समूचे शैक्षणिक जगत में गर्व का संचार भर दिया.
इस प्रकार लगभग दिन भर चले इस कार्यक्रम के समापन का समय नजदीक आ गया ! मुख्य अथिति को जलपान आदि की व्यवस्था भी की गई ! मुख्य अतिथि के साथ सामूहिक फोटोग्राफ भी लिए गए ! विधालय के प्रधानाध्यापक उन्हें मुख्य द्वार तक छोड़ने गए ! इसके बाद बच्चो ने भी जलपान आदि किया ! अपने कक्षा-अध्यापको के साथ उनके भी फोटोग्राफ लिए गए ! और शाम होने तक सभी अपने अपने घरो की और लोटने लगे ! इस प्रकार हमारे विधालय के वार्षिक उत्सव का समापन हुआ और कई छात्रों के मन में इस कार्यक्रम की रूप रेखा यादो के रूप में सदैव अमिट रहेगी.

    26 January (Republic Day) in Hindi - गणतंत्र दिवस की जानकारी?

    गणतंत्र दिवस अर्थात 26 जनवरी भारत में अत्यधिक राष्ट्रीय महत्व का दिन है ! क्योंकि इसी दिन सन 1950 में देश का संविधान पूर्णतया लागु हुआ था और तब से हर वर्ष यह गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है ! आजाद होने से पूर्व भी इस दिन स्वतंत्र होने की प्रतिज्ञा को दोहराया जाता था ! लेकिन अब देश के आजाद हो जाने के बाद इसे प्रति वर्ष देश की प्रगति दिखाने वाले दिन गणतंत्र दिवस के रूप में जाना जाता है और देश की रक्षा के प्रतीकों, तकनीको, आधुनिक-हथियार,रक्षा-प्रणाली सैन्य-संसाधनो आदि की विशिष्टता को भी दिखाया जाने लगा है.

    अखिल भारतीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया था की- ‘’पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करना ही हमारा धेय्य है !’ पंडित जवाहर लाल नेहरु ने रावी नदी के तट पर सर्व प्रथम तिरंगा लहरा कर यह घोषणा की थी की यदि ब्रिटिश सरकार को ओपनिवेशक स्वराज हमे देना है तो दे, अन्यथा 1 जनवरी 1930 से इसके बाद हमारी मांग पूर्ण स्वराज की होगी ! इस घोषणा के बाद कांग्रेस द्वारा तैयार घोषणा पत्र को भी सार्वजनिक रूप से पढ़ा गया.
    इसी क्रम में 26 जनवरी 1930 को तिरंगे के साथ जुलुस निकाले गए और कई सभाए भी की गयी ! यह निश्चित किया गया की जब तक हमे पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं मिल जाती हमारा यह आन्दोलन जारी रहेगा चाहे इसमें अब कितनी भी बाधा और विपदा आ जाए ! इस प्रकार आजादी को पाने की इस कोशिश में कइयो ने लाठी-गोली खाई और जान की बलि दी ! इस प्रकार कई परेशानिया पाकर आखिर 1947 में स्वतन्त्रता का सपना साकार हुआ और देश को अंग्रेजो से और इनके शासन से आजादी मिल गयी.
    1950 में जब संविधान बनकर तैयार हो गया तो इसे लागु करने की तिथि को लेकर भी काफी गहन विचार-विमर्श हुआ ! सविधान सभा के अध्यक्ष भीम राव आंबेडकर ने प्रजातंत्र शासन की घोषणा करते हुए अंत में इसे 26 जनवरी 1950 को लागु भी कर दिया गया ! इस प्रकार देश के लिए यह दिन अत्यंत महत्व रखता है क्योंकि इसी दिन सारे नागरिको को संविधान के समान अधिकार दिए गए ! संविधान में स्पष्ट किया गया की भारत अनेक राज्यों का एक संघ होगा.
    जनता में देश भक्ति की भावना जाग्रत करने और उत्साह की प्रेरणा देने के उद्देश्य से गणतंत्र दिवस के आयोजन पर केंद्र और राज्य सरकार द्वारा अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है ! जिला मुख्यालयों से लेकर हर सरकारी भवन तक इसे उत्सव के रूप में मनाया जाता है ! यह समारोह विशेष रूप से देश की राजधानी दिल्ली में विशेष मनाया जाता है ! गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश के राष्ट्रपति का देश की आम जनता के नाम सन्देश आता है ! और अगले दिन गणतंत्र दिवस को अमर जवान ज्योति के अभिवादन के साथ इस कार्यक्रम की शुरुआत होती है.
    सर्व प्रथम देश के प्रधान मंत्री द्वारा अमर जवान ज्योति का अभिवादन किया जाता है ! इसके पश्चात राष्ट्रपति देश की सेनाओ की सलामी लेने के लिए इंडिया गेट के मंच के पास आते है जहा तीनो सेनाओ के सेनापति उनका सम्मान करते है ! इसके बाद राष्ट्रपति अपना आसन ग्रहण करते है जहा उनके साथ अन्य देशो के प्रमुख भी अथिति रूप में होते है ! सैनिको को श्रेष्ठ कार्यो के लिए सम्मान दिया जाता है.
    इसके बाद गणतंत्र दिवस की मुख्य परेड शुरू होती है ! इसमें सर्वप्रथम जल, थल और वायुसेना के अधिकारी आगे चलते है जिन्हें परमवीर, अशोक और शौर्य चक्र आदि से सम्मानित किया जाता है ! इसके साथ ही सेना की तीनो टुकडियो के अलावा सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल, भारत तिब्बत सीमा पुलिस बल, ओधोगिक सुरक्षा बल आदि शामिल होते है ! इसमें सेना के बैंड राष्ट्रीय धुन बजाते हुए चलते है ! इसके बाद राज्यों की संस्कृति और उपलब्धि को दिखाती हुई कई प्रकार की रंग-बिरंगी झांकिया आती है ! और अंत में विभिन्न स्कूलों के बच्चे रंग-बिरंगी वेशभूषा में कई प्रकार के करतब दिखाते हुए साथ चलते है.
    राज पथ से निकल कर यह परेड इंडिया गेट होती हुई लाल किले तक जाती है ! किन्तु पिछले कुछ वर्षो से आतंकी गतिविधियों की वजह से इसका मार्ग बदल कर बहादुर शाह जफ़र मार्ग करते हुए लाल किले तक कर दिया गया है ! परेड के अंत मे वायु सेना के विमान आकाश में तिरंगा बनाते हुए विजक चौक के ऊपर से गुजरते है ! कुछ विमान पुष्प वर्षा भी करते है ! इस अवसर पर संसद भवन के साथ ही राष्ट्रीय महत्व के अन्य प्रतीक स्थलों पर विशेष सजावट और रौशनी भी की जाती है ! फिर इसी दिन शाम को देश के राष्ट्रपति द्वारा अपने निवास पर सांसदों, राजनेताओ अन्य देशो से पधारे हुए मेहमान और राजदूतो के साथ स्थानीय गणमान्य नागरिको को सामूहिक भोज भी दिया जाता है.

      Light Festival "Diwali" in Hindi - दीपावली की जानकारी?

      हिन्दू धर्म में लगभग हर रोज कोई न कोई त्यौहार होता है ! इन सब त्योहारों में भी होली, दशहरा और दीपावली मुख्य त्यौहार माने जाते है ! प्रकाश-पर्व अर्थात दीपावली हर वर्ष कार्तिक माह की अमावस्या को मनाया जाता है ! यह जीवन में प्रकाश फ़ैलाने वाला पर्व भी माना गया है ! इस दिन अमावस्या की वह अँधेरी रात दीपक और मोमबत्ती आदि की रोशनी से जगमगा उठती है ! चारो और का सम्पूर्ण द्र्श्य प्रकाशमान हो जाता है ! यह खेतो में खड़ी धान की फसल के भी तैयार होने का समय होता है इसलिए किसान परिवार और व्यापारी वर्ग भी इसका उत्सुकता से इंतज़ार कर रहे होते है.

      दीपावली एक बड़ा त्यौहार है और यही इस पर्व की विशेषता है जो पांच दिन तक चलता है ! इसी वजह से लोगो में लगभग एक सप्ताह तक उमंग और उत्साह बना रहता है ! इसकी शुरुआत धन तेरस नामक पर्व से होती है ! इस दिन घर में कोई न कोई नया बर्तन खरीदने की परंपरा है और इसे शुभ भी माना जाता है ! इसके बाद छोटी दिवाली, फिर मुख्य त्यौहार दिवाली मनाया जाता है ! और इसके अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है ! सबसे अंत में पांचवे दिन भाई-बहिन का त्यौहार भैया-दूज मनाकर त्योहारों की इस लंबी श्रंखला का सुखद समापन होता है.

      अन्य कई पर्व के समान दिवाली का भी धार्मिक और पौराणिक महत्व है ! धन की देवी लक्ष्मी समुद्र-मंथन के चौदह रत्नों में से इसी दिन प्रकट हुई थी ! इसके अलावा जैन सम्प्रदाय के मतानुसार यह महावीर स्वामी का महानिर्वाण दिवस भी है ! भारतीय संस्कृति के आदर्श पुरुष भगवान श्री राम आज ही के दिन लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे थे ! उनकी वापसी पर खुश होकर अयोध्यावासियो ने रौशनी से घर सजाये, बंदनवार बनाये, अपने घरो और महलो का रंग-रोगन आदि किया गया ! अपने प्रिय राजा के वापस राज्य में लोटने की ख़ुशी में रात में दीपो की माला बनाकर भी सजाया तभी से यह दीपावली अर्थात दीपो की अवली का त्यौहार दीप-पर्व बन गया और इसी दिन प्रति वर्ष दीपक जलने की नयी परंपरा का चलन शुरू हो गया जो आज तक अनवरत रूप से जारी है.

      इतिहास की कुछ अन्य घटनाओ पर नजर डाले तो भी दीपावली का दिन विशेष महत्व का लगता है ! सिक्खों के छट्टे गुरु हरगोविंद सिंह आज ही के दिन मुग़ल शासक ओरंगजेब की कैद से मुक्त हुए थे ! उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का आज ही के दिन सिंहासन-अभिषेक हुआ था ! आचार्य विनोबा भावे जो की सर्वोदयी नेता भी कहे जाते है, उन्होंने भी आज ही के दिन अपनी अंतिम श्वास ली ! प्रसिद्ध वेदांती स्वामी रामतीर्थ और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी आज ही के दिन मोक्ष प्राप्त की थी ! इस प्रकार कई महान हस्तियों का दीपावली के इस दिन से विशेष सम्बन्ध है.

      हर किसी को बड़े हर्ष और उल्लास के साथ अपने इस सबसे बड़े त्यौहार के आगमन की प्रतीक्षा होती है ! इस पर्व के आने से महीने भर पहले से ही लोग अपने घरो की साफ़ सफाई और रंग-रोगन आदि करने लगते है ! भिन्न-भिन्न प्रकार की सजावट भी होने लगती है ! दुकानदार अपनी दुकाने सजाने लगते है और व्यापारी लोग नए बही-खाते शुरू होते है ! बाजारों में रंग-बिरंगी पताका लग जाने से माहौल किसी मेले जैसा हो जाता है ! पटाखों की दूकान पर खूब बिक्री और आतिशबाजी होती है ! खील-बताशे और मिठाइयो की अपार बिक्री होती है ! घरो में भी कई प्रकार की मिठाइयाँ और व्यंजन बनाये जाते है.

      संध्या वेला में शुभ मुहूर्त में धन की देवी माँ लक्ष्मी का पूजन किया जाता है ! यह इस त्यौहार का मुख्य दिन भी मन जाता है ! ऐसी मान्यता है की इस रात्रि माता लक्ष्मी का आगमन होता है जिसे सफाई और रौशनी अत्यधिक प्रिय होती है ! इस दिन एकल परिवार भी संयुक्त परिवार बन जाते है और घर के सारे सदस्य इस दिन एक साथ होते है ! इसके बाद लोग एक दुसरे के घरो में जाकर कुशल-क्षेम पूछते है और अन्य बड़ो से आशीर्वाद भी लेते है ! घर-घर में मिठाइयों का आदान-प्रदान होता है.

      सामाजिक परंपरा के साथ ही वैज्ञानिक द्रष्टि से भी इस त्यौहार का अलग ही महत्व है ! गहन साफ़-सफाई और पटाखो की आतिश बाजी से वातावरण में व्याप्त कई प्रकार के कीटाणु समाप्त हो जाते है और समूचा पर्यावरण ही स्वास्थ्यवर्धक हो जाता है.

      कुछ लोग मंगल कामना के इस पर्व पर शराब आदि पीते है और जुआ भी खेलते है जो हमारी सामाजिकता और इस प्रकाश पर्व की नकारात्मक छवि दिखाता है ! आतिश बाजी के लिए छोड़े जाने वाले पटाखों आदि से कई प्रकार की दुर्घटना हो जाने से जन धन की हानि हो जाती है ! ऐसी बुराइयों पर अंकुश लगाने की अत्यधिक आवश्यकता है.

      Short Essay on "Teachers Day" - शिक्षक दिवस की जानकारी?

      हमारी सामाजिक विचारधारा को सही दिशा में क्रियाशील रखने में शिक्षको की अहम भूमिका होती है ! एक शिक्षक न केवल बच्चो को अध्यापन का कार्य करवाता है बल्कि वह देश की भावी नागरिक पीढ़ी को भी तैयार करता है ! शिक्षक राष्ट्र के निर्माण में भागीदार होते है और वे देश की संस्कृति को संरक्षण भी प्रदान करते है ! वे बालको में सुसंस्कार तो डालते ही है साथ ही अज्ञानता रुपी उनका अन्धकार भी दूर करते है ! शिक्षको के इन विशेष कार्यो और अहम भूमिका निभाने के सम्बन्ध में सम्मानित करने का जो जो दिन है उसे ही शिक्षक दिवस कहा जाता है ! हर वर्ष 5 सितम्बर को यह सभी विधालयो और विश्वविधालयो में बहुत ही उत्साह से मनाया जाता है.

      डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जो की भारत के प्रथम राष्ट्रपति होने के साथ ही एक अच्छे शिक्षक भी थे ! इनके जन्म दिवस पर कई सालो से शिक्षक दिवस मनाया जाता है ! वे संस्कृत के अच्छे शास्त्री, महान शिक्षक और दार्शनिक व्यक्ति थे ! कलकत्ता के दर्शन शास्त्र विश्वविधालय में किंग जोर्ज पंचम के पद पर भी वे लगभग 1 वर्ष तक रहे थे ! लगभग 9 वर्ष तक वह काशी के हिन्दू विश्वविधालय के उप कुलपति रहे और इसी पद पर रहते हुए उन्होंने शिक्षको के लिए सम्मान करने के लिए एक विशेष दिन का विचार रखा ! उनके जीवन का अधिकतम समय भी एक शिक्षक के रूप में व्यतीत हुआ था.

      आज भी स्कूल और कॉलेज में शिक्षको के मूल्यांकन और सम्मान के लिए यह एक महत्वपूर्ण दिन है ! इस दिन कई विधालयो में शिक्षण का कार्य छात्र ही देखते है और छात्र-छात्राओ के प्रति विशेष लगाव रखने वाले शिक्षको को इस दिन सम्मानित किया जाता है ! सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन को याद करते हुए उनके विचार रखे जाते है ! विधार्थियों के माध्यम से भी यथाशक्ति अपने शिक्षको को उपहार आदि दिए जाते है ! ज्ञानवर्धक प्रतियोगिताये रखी जाती है ! जीवन में शिक्षक का महत्व बताया जाता है.

      शिक्षक ज्ञान की वह ज्योति है जो अन्धकार युक्त कोमल बाल मन को आलोकित कर देती है ! अध्यापक देश के बालको को साक्षर बनाने का काम तो करते ही है साथ ही विवेक का ज्ञान देकर उनका तीसरा नेत्र भी खोलते है जिससे वे बड़े होकर सही-गलत की परख कर सके और अपने निर्णय स्वयं ले सके ! इस तरह शिक्षक किसी भी देश के पूर्ण समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त करते है.

      अध्यापक की महत्ता बताते हुए महर्षि अरविन्द अपनी एक पुस्तक में लिखते है की –‘ शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के उपवन के माली है वे इसमें संस्कारों की खाद देते है, अपने श्रम से सींच-सींच कर महाप्राण शक्ति बनाते है ! इटली के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार ने कहा है की शिक्षक वह मोमबत्ती है जो स्वयं जलकर दुसरो को प्रकाश देती है ! संत कबीर ने तो शिक्षक को ईश्वर से भी ऊपर दर्जा देते हुए कहा है की-

      ‘गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागू पाय !
      बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय !!

      भारतीय संस्कृति में तो गुरु से आशीर्वाद लेने की अत्यंत ही प्राचीन परम्परा रही है ! अर्जुन –एकलव्य जैसे अनगिनत शिष्यों से हिंदी साहित्य का इतिहास भरा पड़ा है ! ब्रहस्पति को देवगुरु माना गया है ! गुरुकुल में अध्यन-अध्यापन की व्यवस्था आर्य कालीन सभ्यता से ही प्रचलित है ! प्राचीन काल से ही गुरु-शिष्य परंपरा को महत्व देते हुए हर वर्ष आषाड़ माह की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा की विशेष उपमा दी गयी है ! इस दिन गुरु की पूजा और सम्मान को विशेष महत्व दिया गया है.

      इस प्रकार शिक्षक को आदर और सम्मान देना और उसकी कीर्ति का प्रचार –प्रसार करना हमारे देश की केंद्र और राज्य सरकार दोनों का ही मुख्य दायित्व होना चाहिए और शिक्षक दिवस इस दायित्व को पूरा करने का अच्छा दिवस है ! इस दिन स्कूल कोलेज के अलावा सरकार की तरफ से भी बड़े-बड़े आयोजन किये जाते है ! साहित्य की द्रष्टि से श्रेष्ठ शिक्षको को चयनित करके सम्मानित किया जाता है ! समय-समय पर भाषा और साहित्य के उत्सवों का आयोजन किया जाता है.

      देश की राजधानी दिल्ली में भी केंद्र सरकार द्वारा और दिल्ली नगर निगम, दिल्ली नगर पालिका आदि द्वारा अपने-अपने क्षेत्रो के अधीन आने वाले स्कूलों में उनके श्रेष्ठ अध्यापकों का चयन और सम्मान भी किया जाता है ! और राज्य सरकारे भी अपने स्तर पर समय-समय पर कई शैक्षिक सम्मलेन आदि के माध्यम से शिक्षको और शैक्षणिक विषय पर कई प्रकार के वाद-विवाद प्रतियोगिता आदि का आयोजन कराती है.

      इस प्रकार शिक्षक और शैक्षणिक व्यवस्था का यह क्रम बनाये रखने और शिक्षण के कार्य में और अधिक सार्थकता लाने के लिए शिक्षको का आदर-सम्मान करना, उन्हें समय-समय पर पुरस्कृत करना और उनका उत्साह वर्धन करना अत्यंत ही आवश्यक है और इसी क्रम में शिक्षक दिवस की तभी उपयोगिता भी है.

        Introduction of "HOLI" - रंगों का त्यौहार : होली?

        प्राचीन काल से ही त्यौहार भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े वाहक और संरक्षक भी बने हुए है ! त्यौहार हमारे जीवन की नीरस एकरसता को तोड़कर नयी उमंग और हर्ष का संचार करते है ! हमारे परंपरागत त्योहारों में रंगों का त्यौहार होली भी एक महत्वपूर्ण पर्व माना गया है ! इस त्यौहार में संयोग से मिलाप होने की सम्भावना अन्य पर्व की अपेक्षा अधिक होती है और मिल-जुलकर रंग आदि लगाने से यह हमारी समानता की भावना को भी विस्तार प्रदान करता है और समरसता बढ़ाता है.

        हमारे देश में शायद ही ऐसी कोई तिथि है जो किसी न किसी पर्व से जुडी हुई न हो ! भारत में मनाये जाने वाले हर एक पर्व के पीछे कोई न कोई धार्मिक और सामाजिक मान्यता अवश्य ही जुडी रहती है ! होली का पर्व भी एक पौराणिक कथा से जुडा हुआ है ! ऐसी मान्यता है की हिरनकश्यप नामक राक्षस ने जब भगवान का अस्तित्व ही नकार कर अपनी प्रजा को स्वयं को ही भगवान मानने पर विवश कर दिया तब अपने ही पुत्र प्रहलाद के भगवत मार्गी हो जाने पर उसने उसे मारने के लिए कई असफल प्रयास किये और अंत में आग से न जल पाने का वरदान प्राप्त अपनी बहिन होलिका को अपने पुत्र प्रहलाद को अग्नि में लेकर बैठ जाने का आदेश दिया किन्तु भगवत कृपा से उस दिन होलिका तो जल गयी और प्रहलाद सकुशल बच गया ! तभी से इस दिन यह पर्व बुराई को आग में जला देने की मान्यता के साथ हर वर्ष मनाया जाने लगा जो आज तक अनवरत रूप से जारी है.

        रंगों का यह त्यौहार अपार हर्ष और प्रसन्नता का पर्व है ! ब्रज क्षेत्र में तो यह त्यौहार एक पखवाड़े तक चलता है ! इससे पूर्व ही मंदिरों में फाग आदि के कार्यक्रम होने लगते है और सारा माहौल ही भक्तिमय हो जाता है ! लोग इस दिन पुराने वैर-भाव भुलाकर एक दुसरे के गले मिलते है और परस्पर रंग-गुलाल आदि लगाते है ! पूर्णिमा को होलिका का दहन सामूहिक रूप से किया जाता है ! इस अवसर पर महिलाए श्रृंगार कर पूजन आदि करती है.

        मुग़ल बादशाहों की महफ़िलो और शायरी में भी होली का वर्णन हुआ है जिससे साफ़ प्रतीत होता है की यह पर्व मुस्लिम भी प्रसन्नता पूर्वक मानते है ! मीर, जफ़र और नजर आदि की शायरी में होली की धूम का विस्तृत उल्लेख हुआ है जो हमारी लोक परंपरा और सोहार्द का प्रतीक है ! जहाँगीर ने अपने रोजनामचे तुजुक-ए-जहाँगीरी में लिखा की हिंदी संवत्सर के अंत में यह त्यौहार आता है और इस दिन शाम को आग जलाकर दुसरे दिन उसकी राख आदि एक-दुसरे पर मलते है ! अल-बरुनी ने भी अपनी ग्यारहवी सदी की यात्रा में तात्कालिक होली का वर्णन बहुत ही सम्मान के साथ किया है और लिखा है की अन्य दिनों की अपेक्षा इस दिन विशेष पकवान बनते है और ब्राह्मणों को देने के बाद इनका आदान-प्रदान भी होता है ! मुगलों के अंतिम बादशाह अकबर शाह सानी और बहादुरशाह जफ़र तो खुले दरबार में होली खेलने के लिए अत्यंत प्रसिद्ध थे.

        इस पर्व को ऋतुओ से सम्बन्धित भी बताया गया है क्योंकि इन दिनों में मौसम भी सर्दी से गर्मी की और करवट लेने लगता है साथ ही किसानो की मेहनत से तैयार की गयी खेतो में खड़ी फसल भी पक जाती है जिसे देखकर वे ख़ुशी से झूम उठते है ! गेहू की बाली को सामूहिक रूप से होली की आग में भुनकर खाया जाता है और नए अनाज आदि का आदान-प्रदान भी किया जाता है.

        दूसरा दिन धुलंडी का होता है जो एक-दुसरे पर रंग डालकर मनाया जाता है ! इस दिन का विशेषकर बच्चो को बेसब्री से इंतज़ार होता है ! सुबह जल्दी ही हाथो में रंग लिए बच्चो और बड़ो की टोलिया अपना-अपना दल बनाकर गल्ली-मुहल्लों में घुमने लगती है ! एक-दुसरे को गले लगाकर, रंग-गुलाल आदि मलकर होली की बधाई दी जाती है ! रंगों से भरे गुब्बारे और पानी की पिचकारियो से रंग डाला जाता है ! ढोल और चंग बजाये जाते है और लोकगीत गाये जाते है.

        दोपहर तक रंग लगाने का यह कार्यक्रम समाप्त हो जाता है और लोग नहा-धोकर नए कपडे पहन लेते है ! शाम को लोग एक-दुसरे के घर जाते है और बड़ो से आशीष लेते है ! कई जगह इस दिन शाम को मेला आदि लगता है ! कई क्षेत्रो में इस दिन दंगल-प्रतियोगिता, हास्य समेलन, मुर्ख-जुलुस आदि सामाजिक कार्यक्रम भी रखे जाते है.

        होली उत्साह और उमंग का त्यौहार है ! यह हमारे सामाजिक सोहार्द का उत्तम पर्व है किन्तु कुछ लोग इस दिन मदिरा आदि का सेवन कर आपस में ही विवाद कर बैठते है जो हमारे भाईचारे और ज़ीयों और जीने दो के मूल मंत्र पर कलंक के सामान है और इस त्यौहार की गरिमा तथा मूल भावना को ठेस पहुचता है.

        What is illiteracy in hindi - निरक्षरता की जानकारी

        साक्षरता जीवन की पूर्णता, सम्पन्नता और सक्षमता का प्रमाण है ! जीवन को जीने के लिए आवश्यक प्राथमिक शिक्षा की प्राप्ति ही साक्षरता कहलाती है और इसका अभाव ही निरक्षरता ! आजादी के इतने वर्ष बाद भी आज देश के दूर-दराज के दुर्गम- ग्रामीण क्षेत्रो में साक्षरता की स्थिति चिंताजनक है ! किसी भी परिस्थिति या कारणवश व्यक्ति का शिक्षा से वंचित रह जाना या उसे यह प्राथमिक शिक्षा का अवसर प्राप्त ही नहीं हो पाना निरक्षरता के ही दायरे में आता है.

        बढती जनसंख्या, बेरोजगारी, आर्थिक संसाधनों में लगातार आती कमी, लड़का-लड़की में किया गया भेदभाव और महंगाई आदि मुख्य समस्याओं से इसमें लगातार इजाफा होता आया है ! ग्रामीण क्षेत्रो में सुविधाओं की कमी से इसका आकार दिनों दिन बढ़ रहा है ! विधालयो, शिक्षको और यातायात के साधनों की कमी, अनिश्चित विधुत-आपूर्ति, सडको की कमी, जन-चेतना और जाग्रति में कमी आदि से देश के गाँवों में आज भी यह समस्या एक मुख्य चुनौती के रूप में बनी हुई है.

        निरक्षरता के कारण:-

        एक सर्वे के अनुसार आज भी देश के चार करोड़ बच्चो ने विधालय का मुह तक नहीं देखा है ! गरीब परिवारों की कई लडकियों का स्कूल जाना एक सपना ही है ! स्त्री शिक्षा का स्तर तो देशभर में चिंताजनक है ! आज भी गाँव के सरकारी विधालयो का स्तर यह है की किसी में पढने को कमरे और शौचालय नहीं है, कही अध्यापक नहीं है और ये सब है तो वह पहुचने को सड़क और साधनों की कमी है ! देश के कई क्षेत्रो में महिला अध्यापको की कमी है इस वजह से अधिक उम्र की लडकियों को अभिभावक विधालय भेजने से कतराते है ! कई बार परिवार की आर्थिक स्थिती ख़राब होने से उनसे घर के काम में मदद ली जाती है जिनसे उनकी पढ़ाई बीच में ही छुट जाती है ! बाल-विवाह जैसी कुरीति भी निरक्षरता को बढ़ावा देती है ! आज भी घर-परिवार में काम का बोझ लडको के मुकाबले लडकियों पर अधिक है ! गाँवों में पांच से सात वर्ष की होने पर ही इनसे काम लिया जाने लगता है और इसे माता-पिता के काम में हाथ-बंटाने की संज्ञा दे दी जाती है ! विधालयो में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षक के सैंकड़ो पद कई सालो तक खाली पड़े रहते है, और यदि यह पद भर भी जाये तो फिर शिक्षक ग्रामीण क्षेत्रो में शिक्षण कराने में रूचि ही नहीं लेते है ! आज भी कई विधालयो में पुस्तकालय और खेल के मैदान की कमी है ! निशुल्क स्तर पर गणवेश और पुस्तके देने के बावजूद लोग सुविधाओं के अभाव में सरकारी की अपेक्षा निजी विधालय को प्राथमिकता देते है जिससे गरीब व्यक्ति उस स्तर तक पैसा खर्च नहीं कर पाता और उसके बच्चो को शिक्षा से वंचित रहना पड़ता है ! जिसके फलस्वरूप प्रवेश के आंकड़े कम होने से वह विधालय समायोजित कर दिया जाता है.

        निरक्षरता के प्रभाव:-

        इस प्रकार मनुष्य के सर्वांगीण विकास में शिक्षा का अधिक महत्व है क्योंकि यही उसे सामाजिक और आर्थिक जीवन-जीने का सामर्थ्य प्रदान करती है और व्यक्ति के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाती है ! इससे मानव का बोद्धिक और मनोवैज्ञानिक स्तर भी बढ़ता है ! शिक्षा के अभाव में बचपन में बच्चो के कोमल मस्तिष्क का मानसिक विकाश नहीं हो पाता और यह कमी बड़े होने पर उनके चरित्र में यथास्थिति रह जाती है ! अशिक्षित व्यक्ति सही गलत की परख अपने विवेक से नहीं पर पाता और उसे अपने निर्णय लेने में भी परेशानी होती है ! शिक्षा की यह कमी उसे रोजगार से लेकर जीवन पर्यंत उसके सामाजिक जीवन में खलती रहती है ! परिस्थिति चाहे जो भी रही हो किन्तु उम्र का यह स्तर पार कर लेने के बाद उसे शिक्षा पाने का यह अवसर जीवन में दोबारा से मिल ही नहीं पता और वह घर –परिवार और समाज की जिम्मेदारियों के तले दब सा जाता है ! आधुनिक युग में अशिक्षित व्यक्ति को शिक्षा की कमी अधिक खलती है और जीवन के हर स्तर पर वह इसकी आवश्यकता को महसूस करता है ! महिला-सशक्तिकरण में शिक्षा अत्यंत आवश्यक है बिना शिक्षा के सरकारी साक्षरता के कार्यक्रमों की कोई उपयोगिता ही नहीं रह जाती है ! सरकार की बालिका कल्याण की योजनाओ का कोई ओचित्य नहीं है.

        उपसंहार:-

        शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारने और निरक्षरता को जड़ से मिटाने के लिए सरकार को और समाज को मिलकर काम करना होगा तभी यह गंभीर समस्या नियंत्रित हो सकती है ! सरकार को उच्च स्तर में बालिका शिक्षा निशुल्क करने, साईकिल और लैपटॉप का वितरण करने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा की पहले प्राथमिक स्तर की शिक्षा पाना और उनका विधालय जाना संभव हो सके ! आज भी सरकार की और से सकल उत्पाद का सिर्फ छह प्रतिशत ही शिक्षा पर खर्च होता है ! इस प्रकार प्राथमिक शिक्षा तो हमारे जीवन की बुनियाद और जीवन की मूलभूत आवश्यकता है.

        जल संकट पर निबंध - (Water problem and solution) in hindi?

        पेयजल की समस्या इक्कीसवी सदी की सर्वाधिक गम्भीर समस्याओ में से एक है ! आज दुनिया भर की अठारह प्रतिशत आबादी को पीने योग्य शुद्ध जल उपलब्ध नहीं है ! एक अनुमान के अनुसार लगभग बाईस लाख लोग तो हर साल साफ़ जल नहीं मिलने की वजह से होने वाली घातक बीमारियों से मर जाते है ! स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करके ऐसी अकाल मौतों को कुछ हद तक कम किया जा सकता है ! विकाशशील देशो में कई जगह तो स्थिती इतनी विकट है की महिलाये छह किलोमीटर तक पैदल चलकर पीने योग्य जल की व्यवस्था करती है ! स्वच्छ जल का लगभग आधा भाग कई प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारणों से प्रदूषित हो ही जाता है या फिर उचित संग्रह के अभाव में वह व्यर्थ ही बह जाता है ! राजनितिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में भी जल की स्वच्छता को लेकर विशेष प्रयास होते दिखाई नहीं दे रहे है.

        पेयजल की आवश्यकता:-

        जल ही जीवन की पराकाष्टा है और जल के बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है ! शरीर को स्वच्छ जल की उतनी ही आवश्यकता है जितनी प्राणवायु ऑक्सिजन और भोजन की होती है ! इसके अलावा भी क्रषि जैसे आधारभूत रोजगार के लिए विश्व भर में लगभग सत्तर प्रतिशत ताजा जल का उपयोग होता है ! वन्य जीव से लेकर वनस्पति तक जल सबकी परम आवश्यकता है ! भारत में केवल 42 प्रतिशत लोगो को ही शुद्ध पेयजल उपलब्ध हो पाता है ! शिशु म्रत्यु दर को बढाने में भी अशुद्ध जल की ही मुख्य भूमिका होती है ! इस प्रकार पानी की गुणवत्ता के आधार पर भारत का विश्व भर में बारहवा स्थान है ! आज भी विश्व के लगभग तीस प्रतिशत देश साफ़ पानी की कमी से जूझ रहे है ! वैज्ञानिको के अनुसार विश्व भर की लगभग दो तिहाई आबादी 2020 तक पिने योग्य पानी की भयंकर कमी वाले क्षेत्रो में रहने को मजबूर हो जायेगी और इसका विकल्प तलाशना भी आसान नहीं होगा.

        पेयजल-प्रदूषण के कारण और निवारण:-

        उचित सफाई व्यवस्था जल को प्रदूषित होने से बचाने का सबसे सरल तरीका है ! विश्व भर में सतह के लगभग सत्तर प्रतिशत भाग पर जल है किन्तु पीने योग्य जल तो सिर्फ 2.5 प्रतिशत ही है और इस स्वच्छ जल का भी दो तिहाई भाग बर्फ़ के रूप में ग्ल्येशियर में जमा पड़ा है ! इस प्रकार धरती पर पीने योग्य सुलभ जल तो मात्र 1 प्रतिशत ही आसानी से उपलब्ध है और उसका आधा भाग हमारे दुरूपयोग की बलि चढ़ रहा है ! आज उद्योगों से निकलने वाले विषैले रसायन जल को अशुद्ध बना रहे है और उसमे लगातार जहर घोलकर बिमारियों को जन्म दे रहे है ! कई प्रकार की गन्दी नालिया और संक्रमित जल का एक बड़ा हिस्सा रोज इनके माध्यम से तालाब और नदी जैसे जलस्त्रोत में मिल रहा हैं इससे जलीय जीव भी अकाल मौत मर रहे है और समुद्री क्षेत्रो में इनका खादान्न के रूप में प्रयोग किया जाना कई प्रकार की घातक बिमारियों को साक्षात् आमंत्रण है ! जलवायु परिवर्तन से प्राक्रतिक जल स्त्रोत तेजी से कम हो रहे है ! इससे पर्यावरण और स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरे भी उत्पन्न हो रहे है ! दूषित जल से सब्जी और अनाज के रूप में जहरीले तत्व हमारे शरीर में जाकर हमारा स्वास्थ्य ख़राब कर रहे है ! आज एशिया में बहने वाली नदियों में घरेलु कचरे की अधिक मात्रा होने से विश्व भर की अन्य नदियों की अपेक्षा शीशे की मात्र बीस गुना बढ़ गयी है ! संयुक्त राष्ट्र संघ की जल विकाश रिपोर्ट में भी भारत को प्रदूषित जल की आपूर्ति वाला देश बताया गया है ! हमारी त्रुटिपूर्ण सिचाई व्यवस्था से जल का उचित उपभोग नहीं हो पाता और 60 प्रतिशत तो वह भाप के रूप में उड़कर वापस समुद्र में चला जाता है ! अधिक मात्रा में अवांछित जल भर जाने से कृषि योग्य भूमि भी दलदल युक्त निम्न स्तर की हो जाती है.

        उपसंहार:-

        जनसंख्या के लगातार बढ़ने से और वायुमंडल में तेजी से आ रहे बदलावों के फलस्वरूप आज प्रथ्वी के मीठे पानी के मुख्य जल स्त्रोत सूखने की कगार पर है ! ओधोगिक ईकाईयों में क्लोरिन, अमोनीया जैसे हानिकारक तत्व लगातार घुल रहे है ! ये जल के माध्यम से हमारे शरीर में जाकर श्वसन, चर्म और रक्तचाप सम्बन्धी बीमारी को बढ़ावा दे रहे है ! इसके लिए सूखे और गिले कचरे का उचित निस्तारण किया जाना, हानिकारक रसायनों पर रोक लगाकर उनका अन्य विकल्प तलाशना, स्वच्छ जल का आवश्यकतानुसार उचित प्रयोग किया जाना अत्यंत जरूरी है ! साथ ही वर्षा के साफ़ जल का पर्याप्त संग्रह, सघन वृक्षारोपण और प्लास्टिक आदि हानिकारक पदार्थो पर तुरंत प्रभावी ढंग से लगाईं गयी रोक इस दिशा में कारगर सिद्ध होंगी अन्यथा पीने योग्य जल को लेकर विश्ब भर में यही स्थिती बनी रहेगी और इस दिशा में प्रयास नहीं किया गया तो यह लगातार और विकराल होती जाएगी.

        What is "ATM" (Full Essay) in Hindi - एटीएम क्या होता है?

        बैंक और इससे सम्बद्ध सभी संस्थाओ का प्रमुख कार्य है- जो राशी आवंटित की गयी है उस पर ब्याज लेना साथ ही अपने ग्राहकों की जमा राशी पर उन्हें ब्याज जोड़कर वापस देना. 1969 में जब सभी बैंक राष्ट्रीयकरण के दायरे में आ गए तो बैंकिंग में भी व्यक्तिगत और सामाजिक रूप से परिवर्तन आये. इसमें बैंक अपने संसाधनो का प्रयोग प्राथमिक स्तर पर व्यक्तिगत और सामाजिक विकास के अनुसार करने लगे. यह बैंकिग प्रणाली लगभग दो दशक तक सामान्य रूप से चली. फिर उदारीकरण आ जाने से बैंकिग के क्षेत्र में नए दौर का युग आया जिससे आर्थिक स्थिरता अत्यधिक और अधिक मजबूत हुई. 

        अन्य बैंक से लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच इन्हें कई नई योजनाओ को भी समावेशित करना पड़ा. यह परिवर्तन भौतिकवादी और उपभोक्तावादी दोनों रूप में आया था. बैंक के कार्य में पारदर्शिता ,संतोष दायक कार्य-प्रणाली और त्वरित परिणाम के लिए लघभग हर शाखा को कंप्यूटर से युक्त कर दिया गया. ग्रामीण क्षेत्रो में भी यह परिवर्तन आया और वहा भी ग्राहक से बेहतर कार्य-व्यवहार को प्राथमिकता दी जाने लगी है. रिटेल बैंकिंग एक ऐसी व्यवस्था है जो ग्राहक की आवश्यकताओ और प्राथमिकताओ के अनुसार विकसित की गयी है और इसी से सम्बन्धित एक शब्द है- ATM.

        ATM का सामान्य परिचय:-

        ATM को सामान्य शब्दों में ऑटोमेटेड टेलर मशीन कहा जाता है ! 1939 में सर्वप्रथम LUTHER JEORJE SIMJAN ने अपना यह आविष्कार बाज़ार में उतरा किन्तु वे इसमें पूरी तरह सफल नहीं थे ! बाद में DON WETGEL ने 1968 में इसका सफल और संशोधित रूप बनाया ! ऐसा कहा जाता है की प्रथम ATM मशीन न्यूयार्क के केमिकल बैंक RACKVILEY CENTER में लगाईं गयी ! उस समय इसकी मशीन को दीवार में स्थायी किया जाता था ! यह मशीन नकदी तो तुरंत उपलब्ध करा देती थी किन्तु इसे खाते का नामान्तरण करने में समय लगता था और उसका कारण भी स्पष्ट था की ATM का उसकी शाखा के कंप्यूटर से कोई सम्बन्ध नहीं हुआ करता था.

        ATM का वर्तमान स्वरूप और कार्यप्रणाली:-

        आज का ATM अपने ग्राहक की शाखा तथा उसके कंप्यूटर से पूरी तरह से जुडा हुआ है ! यह हफ्ते के सातो दिन और चौबीसों घंटे काम करता रहता है ! वह अपने उपभोक्ता को अपने खाते की जमा-निकासी की सुविधा तुरंत मोबाइल पर सन्देश के द्वारा पंहुचा देता है और इस सेवा के शुल्क के रूप में अपने बैंक के लिए धन का अर्जन भी कर रहा है ! इसके कुशल संचालन के लिए ग्राहक को अपनी शाखा से गोपनीय PIN-PERSONAL IDENTY NUMBER दिया जाता है ! लेन-देन से सम्बन्धित काम के अतिरिक्त यह कई अन्य महत्वपूर्ण काम जैसे पासवर्ड बदलना, मोबाइल का पंजीकरण, चेक जमा करना, किसी योजना का क्रियान्वयन आदि OTP कोड के माध्यम से आसानी से कर रहा है ! कई आधुनिक एटीएम मशीन से तो धन का स्थानान्तरण भी कुशलता से किया जा रहा है ! वह अपने खाते का बचा हुआ बैलेंस बताने उसका अपडेट स्टेटमेंट दिखने में भी सक्षम हो गया है ! एटीएम का मास्टर इंटरनेशनल कार्ड तो दुनिया के किसी भी देश में मान्य है ! बल्कि आज के एटीएम तो अन्य सभी बैंक के एटीएम कार्ड भी स्वीकार करने लगे है ! कुछ अतिरिक्त राशी का भुगतान कर किसी अन्य बैंक के उपभोक्ता को भी वो सभी सेवाएँ प्रदान कर दी जाती है जो दूरस्थ होता है या वह तक किसी कारणवश पहुच पाने में असमर्थ है.

        ATM के लाभ:-

        एटीएम कार्ड और उसका प्रयोग आज के हर बैंक ग्राहक की मुख्य आवश्यकता बन गया है ! अपने कार्ड और नेट बैंकिंग के माध्यम से आज का उपभोक्ता घर बैठे ही अपने मोबाइल पर इन्टरनेट के प्रयोग से सभी सेवाओ का उचित उपयोग कर लेता है, किसी भी प्रकार का सरकारी बिल हो या किसी सेवा का भुगतान वह यथास्थान से ही सभी कार्य आसानी से कर लेने में सक्षम है ! यही कारण है की आज लगभग सभी बड़े कार्यालयों, पेट्रोल पंप, एयरपोर्ट, होटल आदि के बाहर अत्यधिक मात्रा में ATM लगाए जा रहे है ! एटीएम ने न केवल बैंक के कर्मचारियों का भार कम करते हुए इनके कार्यालयों से उपभोक्ता की भीड़ को हटाया है बल्कि कई आवश्यक सेवाओ से इनके उपभोक्ता के समय और श्रम को भी बचाया है.

        उपसंहार:-

        इस प्रकार कहा जा सकता है की पिछले एक हज़ार वर्षो के मुकाबले बीसवी सदी में जो सुचना क्रान्ति का उदय हुआ है वह अत्यंत प्रभावशाली है ! समय के साथ-साथ तकनीक के होने वाले परिवर्तनों में सुचना और प्रोधोगिकी का तीव्र विकास हुआ है ! आधुनिक सभ्यता के आसान जीवन में कंप्यूटर की प्रणाली से संचालित एटीएम की सेवा तीव्रता से इसके उज्जवल भविष्य की और अग्रसर है ! इन सबकी वजह से ही ATM जैसी सेवाएँ और इनका व्यापक प्रयोग आज की हमारी परम आवश्यकता बन गयी है.

        Mission "Chandrayaan 1" essay in hindi - चंद्रयान अभियान?

        मानव रहित अपने पहले चंद्रयान का सफल प्रक्षेपण कर भारत ने अपनी गिनती अन्तरिक्ष जगत के कुछ चुनिन्दा देशो के नाम में करवा दी है ! 22 अगस्त 2008 को हमारी उपलब्धियों में एक और कड़ी जुडी तथा भारत की चंद्रमा पर पहुचने की यह कोशिश सफल रही ! इस मामले में भारत का स्थान भले ही छठा हो पर इसने इस अभियान से जुडी हुई सारी गणनाओं के सफल क्रियान्वयन से उम्मीद की एक और किरण जगा दी ! रूस और अमेरिका ने जो काम बीसवी शताब्दी में किया था उस और उठाया गया हमारा यह कदम भविष्य में मील का पत्थर ही साबित होगा ! 22 अक्टूबर 2008, बुधवार, को श्री हरिकोटा का सतीश धवन केंद्र में अन्तरिक्ष केंद्र के प्रमोचन पेड़ पर भेजे जाने वाला मानव रहित चंद्रयान अपनी पहली परीक्षा का इंतज़ार कर रहा था.

        Mission का सफल क्रियान्वयन:-

        देश के वैज्ञानिको ने इस ऐतिहासिक पल को यादगार बनाने की पूर्ण तैयारी पहले ही कर ली थी ! निर्धारित समय छ: बजकर बाईस मिनट पर जैसे ही pslv c-11 राकेट अपने निर्धारित स्थान के लिए रवाना हुआ वैज्ञानिको का कलेजा धक्-धक् कर उठा किन्तु आकाश में सामान्य बादल वाले मौसम में जैसे ही यान 18.2 मिनट में प्रथ्वी के केंद्र की कक्षा में पंहुचा तो सभी की बाहें खिल गयी ! यह अन्तरिक्ष में भारत का इतिहास रचने वाला दिन था ! हर भारतीय का मन इस अपूर्व सफलता से प्रसन्न हो उठा और इस mission के सूत्रधार भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन (isro) के प्रमुख जी. माधवन नायर ने ख़ुशी व्यक्त करते हुए कहा की ‘ आज के ऐतिहासिक दिन से भारत की चन्द्र-यात्रा की शरुआत हो चुकी है है और इस और हमारा पहला कदम बिलकुल सही व सटीक पड़ा है !’ देश की तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी देश के वैज्ञानिको को बधाई देते हुए कहा की ‘आने वाले अनुसंधानों के लिए यह अभियान मील का पत्थर साबित होगा.

        प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने कहा की’ आज के इस ऐतिहासिक प्रेक्षपण से भारत के चन्द्र अभियान की शुरुआत कर दी है ! डा. कलाम ने ख़ुशी व्यक्त करते हुए कहा की-‘ हमारा पहला कदम इस दिशा में सटीक पड़ा उम्मीद करता हु आगे भी हम सही दिशा में आगे बढ़ेंगे ‘! उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा की ‘ isro की यह उपलब्धि हम सबको गर्व महसूस कराती है ‘!इस mission की सफलता में एक हज़ार भारतीय वैज्ञानिको की जी-तोड़ मेहनत थी ! इसी क्रम में भारत की और से दूसरा चंद्रयान भी 2010 से 2012 के बीच भेजा जाना प्रस्तावित है ! 2014 में एक अन्तरिक्ष यात्री को भी भेजे जाने का isro ने निश्चय किया है, जिसकी सीमा बढ़ाकर 2020 तक हो सकती है ! इसके बाद भारत ने अगले प्रोजेक्ट सूरज की भी तैयारी शुरू कर दी है और ‘आदित्य ‘ नाम के एक यान को सूर्य की बाहरी कक्षा ‘केरोनो’ के शोध के लिए तैयार किया जा रहा है.

        अभियान से होने वाले लाभ:-

        चन्द्रयान से भारत कई राष्ट्रीय हित परोक्ष और अपरोक्ष रूप से जुड़े हुए है ! जैसे की चन्द्रमा पर आसानी से उपलब्ध हीलियम-३ भविष्य में हमारी उर्जा प्राप्ति का विकल्प भी बन सकता है ! हीलियम नाभिकीय संयंत्र का मुख्य ईधन है ! आज की वव्साय के क्षेत्र में इतनी अधिक मांग नहीं है किन्तु वैगेनिको का अनुमान है की यह भविष्य में कीमती साबित हो सकता है ! चंद्रमा पर मोजूद हीलियम की उपलब्धता इतनी है की वह आठ हज़ार साल तक पूरी दुनिया की उर्जा की पूर्ति कर सकता है ! इस प्रकार दो साल तक यह हमारे लिए कई प्रकार की उपयोगी जानकारी चाँद पर रहकर ही जुटाएगा ! बेंगुलुर स्थित पीन्या के वैज्ञानिक इस पर नियंत्रण रखेंगे और सूचनाओ का संग्रह करेंगे ! अगले दो सालो तक यह प्रथ्वी के इस सबसे प्रिय उपग्रह चंद्रमा के रहस्यों को हम तक पहुचता रहेगा.

        अन्य विदेशी अभियान:-

        सोवियत संघ ने 12 सितम्बर, 1959 को लूना-ii को चाँद पर पहुचाया था !1) अमेरिका ने 1961-1972 के बीच छ: spacekraft चन्द्रमा पर भेजे.
        2) जापान ने भी 2007 में कायुगा नामक यान चन्द्र mission पर भेजा.
        3) चीन ने भी इसी वर्ष 2007 में चेंगे-i को इस यात्रा पर भेजा.

        उपसंहार:-

        इस अभियान का सफल कदम भारत की अन्तरिक्ष में एक बड़ी छलांग है ! अपने पहले ही प्रयास में सफल होने से भारत की वर्चस्व इसके समक्ष राष्ट्रों में और भी ज्यादा बढ़ गया है ! और यह भी अच्छी बात रही की भारत ने अन्य राष्ट्रों के मुकाबले इसे कम से कम लागत में प्राप्त किया साथ ही वैज्ञानिको ने यह सन्देश भी दे दिया है की वे अन्तरिक्ष की हर चुनौती का सामना करने में सक्षम है ! साथ ही हम ये सीख भी दे सके की कार्य को कर्मठता से किया जाये तो हम कही भी सफलता का परचम पहरा सकते है.

        Death Penalty or Capital Punishment Eassy in Hindi - मृत्यु दंड?

        म्रत्यु दण्ड (death penalty) या मानवीय गरिमा का हनन (capital punishment) न्यायालय ने फांसी की सजा के माध्यम से कुछ जघन्य मामलो में न्याय का श्रेष्ठ सन्देश आम जनता को दिया है इनमे प्रमुख है – देश की आत्मा अर्थात संसद पर हमला करने वाले शौकत और अशफाक, नैना-साहनी हत्याकाण्ड का मुख्य अभियुक्त सुशील शर्मा (अक्टूबर-नवम्बर, 2003) और दारासिंह का मामला जो ग्रैहम stanes के हत्याकांड का मुख्य अभियुक्त था.

        इन सब के साथ ही समाज के कुछ क्रूर और निर्दयी मामलो के क्षेत्र में भी लम्बे समय से लोगो द्वारा म्रत्युदण्ड देने की मांग उठाई जा रही थी ! इसमें सामाजिकता का उपहास करने वाले बलात्कारी से लेकर माशेल समिति की अनुशंसा पर नकली दवा बनाने वाले डॉक्टर आदि को भी शामिल करने की बाते बार-बार उठ रही थी ! और एक तरह से देखा जाये तो इनके अपराध की गंभीरता के अनुपात को देखते हुए म्रत्युदण्ड इनके लिए सही ही प्रतीत होता दिखता है किन्तु दूसरी तरफ इसका दूसरा पहलु भी है और इसके विपक्ष में कुछ लोग मर्त्यु दण्ड का विरोध भी करते है.

        एक बार फिर से इस प्रावधान को हटाने की बहस लगातार जोर पकडती जा रही है ! इसकी दो बातें विशेष है – एक तो म्रत्युदण्ड से लोग ऐसा अपराध करने से डरेगे और इससे दुरी बनायेंगे तथा दूसरा समाज में ऐसा न करने का सन्देश लोगो में जायेगा ! लेकिन इसके विपक्षी लोगो का तर्क है की कानून में सजा का प्रवधान ही इसलिए होता है की अपराधी को सुधरने और स्थिती को समझने का मौका मिले ऐसे में तो म्रत्यु दण्ड को नाय्यिक तरीके से की गयी हत्या ही माना जायेगा ! सरकार ने भी इसे हटाने की घोषणा की है ! मानवाधिकार का भी यही कहना है की-म्रत्यु दण्ड तो मानवीय गरिमा का एक तरीके से हनन किया जाना ही कहा जायेगा.

        यह प्रावधान 1861 में भारतीय दण्ड संहिता में सम्मिलित किया गया है ! 1931 तक यह प्रावधान यथा स्थिती रहा और इसका कोई विरोध भी नहीं हुआ किन्तु इसी वर्ष बिहार की एक क्षेत्रीय सभा के सदस्य ने इसके विरुद्ध विधेयक लाने का असफल प्रयास किया ! 1946 में तत्कालीन अंतरिम सरकार के गृहमंत्री ने भी यह बात स्वीकार करते हुए कहा की ‘यह अपराधो पर नियामक का काम करता है और इन आंकड़ो के प्रावधानों का प्रमाणीकरण और खंडन भी किया’ ! 1955 में एक कानून के बल पर कोर्ट को म्रत्युदण्ड नहीं दिए जाने का कारण बताने की बाध्यता को ही समाप्त कर दिया ! इसके बाद 1973 में यह व्यवस्था की गयी की म्रत्युदंड दिया भी जाये तो इसके कारणों को मुख्य रूप से रेखांकित किया जाना आवश्यक होना चाहिए.

        सर्वोच्च न्यायालय की भी कभी भी ऐसी छान-बीन करने की परंपरा नहीं रही है ! बल्कि उसने तो जगमोहन वाद में अपनी सहमती भी प्रकट की ! 1980 में बच्चन सिंह मामले की एक पीठ ने चार के बदले एक के अनुपात से फैसला सुनते हुए साफ़ किया की यह सविधान के अनुच्छेद 14 या 21 का किसी भी रूप में उल्लंघन नहीं करता है ! एक प्रवृति न्याय प्रक्रिया की विलंबता भी दर्शाती है ! 2 साल तक विलम्ब या अमल नहीं होने पर मर्त्युदण्ड का आरोपी अनुच्छेद 21 के तहत याचना कर सकता है ! धनंजय मामला (1994) में एक विशेष न्याय की प्रवृति दिखाई दी इसमें एक सुरक्षाकर्मी द्वारा एक 18 साल की लड़की की बलात्कार के बाद की गयी हत्या से सम्बन्धित था ! कोर्ट ने साफ़ किया कि अपराध के घ्रणित पक्ष पर प्रकाश डाला जाना भी आवश्यक है.

        बलात्कार की घटना में म्रत्युदंड:-

        बलात्कार की लगातार बढती घटनाओ और उसके अनुपात में मिल रही सजाओ की संख्या से यह साफ़ था की इसकी सजा के प्रावधान में कमी है जिसे दूर किया जाना चाहिए ! यह विधेयक था-‘लडकियों और महिलाओ के साथ बलात्कार निवारण विधेयक -2003’ इसके अनुसार अभियुक्त को या तो मर्त्युदंड या उसके बधियाकरण की सजा होगी ! नैना-साहनी के बहुचर्चित मामले में भी कोर्ट ने स्पष्ट किया की पूरा मामला देखकर अभियुक्त को सिर्फ आजीवन कारावास की सजा पर्याप्त नहीं होगी और यह मामला तो रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर है क्योंकि अपराधी ने शव के टुकडो को काटकर तंदूर में जलाया है जो स्त्रीत्व के भी विरुद्ध है ! तब से इन सब मामलो को संगीन जुर्म की श्रेणी में रखा गया जैसे-लाभ के लिए हत्या करना, हत्या से पहले क्रूरता करना, महिला लाचार हो, आरोपी पैसे वाला और समर्थ हो, सबूत मिटाने या शव को जलने का प्रयास किया गया हो.

        म्रत्यु दण्ड वैश्विक परिप्रेक्ष्य में:-

        1956 में ब्रिटेन से म्रत्यु दण्ड की सजा हटा दी गयी.
        1976 में कनाडा ने इसे प्रतिबंधित किया और इसका स्तर भी गिरा.
        1995 में अफ्रीका के कोर्ट ने इसे असवैधानिक घोषित किया.
        2000 में भी म्रत्यु दण्ड के विरोधियो ने संयुक्त राष्ट्र को 146 देशो के 32 लाख लोगो द्वारा हस्ताक्षर किया गया ज्ञापन सौपा गया था.

        What is "Reservation" in Hindi - आरक्षण क्या है?

        प्रारम्भिक काल से ही कभी धर्म और संस्कृति तो कभी नस्ल या भाषावाद के क्षेत्र में किया गया भेदभाव हर समाज की एक मुख्य समस्या रहा है ! किसी न किसी रूप में प्रत्येक व्यक्ति को इसका सामना जीवन में कही न कही या तो करना ही पड़ा है ! धर्म निरपेक्ष देश होने के बावजूद भारत भी इससे अछूता नहीं रह गया है ! अत; यह भी आरक्षण के आपवाद से बच नहीं पाया है ! संविधान के माध्यम से पिछड़े और शोषित लोगो को कुछ विशेष अधिकार भी प्रदान किये गए ! किन्तु सवाल यह है की क्या यह निति इन लोगो के लिए लाभकारी सिद्ध हुई है.

        प्रमुख कारण:-

        आजादी मिलने से पूर्व में ही समाज के कुछ वर्ग सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक स्तर पर पिछडे हुए थे इनमे अनुसूचित जाती और अनुसूचित जनजाति वाले लोगो की संख्या अधिकतम थी ! सविधान की धारा 46 के तहत सरकार को इनके कल्याण के कदम तुरंत प्रभाव से उठाने के निर्देश मिले ! और धारा 16 के तहत राज्य को इनके कल्याण करने सम्बन्धी विशेष अधिकार भी दिए गए ! इनमे प्रमुख थे-धर्म, जाति, नस्ल, और जन्म स्थान का भेदभाव नहीं हो, अस्पर्श्यता अपराध घोषित हो और शैक्षणिक तौर पर भी इनका उत्थान किया जाये ! किन्तु आरम्भ में यह व्यवस्था केवल शुरूआती 10 वर्षो के लिए ही अस्तित्व में थी और नौकरी के आरक्षण सम्बन्धी प्रावधान में स्पष्ट था की पात्र व्यक्ति को नौकरी दिए जाने से पूर्व उसकी प्रशासनिक कुशलता का पहलु भी ध्यान में रखा जाये ! इससे समाज के सभी वर्गो में विकास की समान धारा बहे तथा देश की शासन व्यवस्था में भी प्रत्येक वर्ग का सहयोग हो ! क्योंकि शिक्षा का महत्व समझने के बाद ही लोग अपने वोट के महत्व को, शासन-व्यवस्था को समझेंगे ! इसी क्रम में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और जनजाति के आयोग की भी प्रथक स्थापना की गयी थी ! और 1999 से ही यह व्यवस्था पिछडो के हित में लागु कर दी गयी.

        आरक्षण के विपरीत प्रभाव :-

        किन्तु वर्तमान परीप्रेक्ष्य में आरक्षण के कुछ विपरीत परिणाम भी सामने आये है ! विगत कुछ वर्षो में यह स्थिती अत्यंत ही गंभीर हो गयी है ! आरक्षण की वास्तविकता यह है की कई ग्रामीण क्षेत्रो में तो आज भी इस व्यवस्था की समझ ही नहीं है और इसका वास्तविक स्वरूप उन ग्रामीण क्षेत्रो में पहुच ही नहीं पाया है जिनको वास्तव में इनकी जरूरत है ! इनको आज भी प्राथमिक शिक्षा और न्यूनतम रोजगार भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है इसलिए ये आर्थिक रूप से भी और पिछड़ते जा रहे है ! देश की राजनैतिक पार्टिया तो आरक्षण को चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाकर आम जनमानस को लगातार गुमराह करती रहती है.

        इसके विपरीत प्रभावों से आरक्षण से रहित अन्य छात्र वर्ग मानसिक पीड़ा भोगता है तथा प्रवेश से लेकर अंको तक में उसके साथ भेदभाव होता है और यह सिलसिला शिक्षा पूरी होने के बाद भी कभी साक्षात्कार के नाम पर तो कभी पदोन्नति के नाम पर अनवरत रूप से चलता ही रहता है ! और इस तरह एक ही क्षेत्र की समान शिक्षा पाकर भी वह छात्र अपने सहपाठी से हर स्तर पर पीछे रह जाता है ! मेडिकल जैसे जीवन खतरे में डालने वाली नौकरी के लिए आरक्षण की व्यवस्था खतरनाक खेल खेलने के समान ही है और कई क्षेत्रो में बाहुबली लोग जिनको की इस सुविधा की आवश्यकता ही नहीं है वो भी राजनितिक दबाव से इसका भरपूर फायदा उठाने लगते है ! और गरीबो की आवश्यकता का यह घटक संपन्न लोगो की सुविधा का एक अवसर बन कर जाता है.

        आरक्षण के परिणाम:-

        आरक्षण के कई प्रकार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव समाज की मुख्यधारा पर पड़े है ! इससे एक और जरूरतमंद को इसका लाभ मिला है और उसे संविधान के तहत जीवन स्तर को सुधारने और बराबरी से जीने में सफलता मिली है ! ऐसी विशेष व्यवस्था समाज के पिछड़े तबके के लिए वरदान साबित हुई है तो वही दूसरी और कुछ शक्तिशाली लोगो ने आर्थिक और राजनैतिक दबाव से इसका दुरूपयोग भी किया है जिससे इसकी गरिमा को नुक्सान भी हुआ है ! इससे अन्य कुशल प्रतिभाओ को भी और ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है और सबको समान अधिकार देने की इसकी मूल भावना का उपहास भी हो रहा है.

        उपसंहार:-

        सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसी भी स्थिती में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण पर रोक लगाने के बावजूद तकनीक के उपयोग और क्रियान्विति, रक्षा और सामरिक क्षेत्र में, वैज्ञानिक कार्यो तथा सुचना प्रोधोगिकी के अन्य क्षेत्र में जहा सिर्फ वरिष्ठ प्रतिभाओ की ही दरकरार है आरक्षण का उपयोग किया जाना विकास की राह में एक रोड़ा ही प्रतीत होता है ! अत: भविष्य में इसके गहराई से विश्लेषण किये जाने और इसकी सबको समान अवसर प्रदान करने की इसकी मूल भावना पर एक बार फिर से मनन और मंथन किये जाने की अत्यधिक आवश्यकता है.

          visit to an exhibition essay in hindi - प्रदर्शनी की सैर पर निबंध?

          भारत की राष्ट्रीय राजधानी नयी दिल्ली का लाल बहादुर शास्त्री मार्ग भारत के उच्चतम न्यायालय के लिए प्रसिद्ध है ! इसे ठीक बायीं और एक विशाल प्रांगण रिक्त ही पड़ा हुआ है जिसे प्रगति मैदान के नाम से सम्बोधित किया जाता है ! यह मैदान एक प्रदर्शनी–स्थली का कार्य भी करता है ! कई प्रकार की राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय प्रदर्शनी यहाँ लगती ही रहती है जो देश की प्रगति को दिखाती है और इसीलिए इस मैदान का नाम प्रगति मैदान ही रख दिया गया.13 फ़रवरी 2000 रविवार का दिन.

          यह प्रगति मैदान में लगने वाले पुस्तक मेले का आखिरी दिन था ! पिताजी ने इसमें जाने की घोषणा पूर्व में ही कर दी थी ! पुस्तक मेले में जाने का इंतज़ार तो हमारा बालमन कब से कर रहा था ! अत: मेले में जाने की वजह से उस दिन का भोजन भी जल्दी बना और हमारी तो सारी तैयारी सुबह ही पूर्ण कर ली गयी थी ! इस प्रकार ग्यारह बजे के निर्धारित समय हम यह प्रदर्शनी देखने के लिए घर से निकल पड़े ! प्रगति मैदान तक पहुचने के लिए हमे अपने परिवार के लिए एक टैक्सी की सेवाएँ ली ! लगभग आधे घंटे की यात्रा कर हम अपने गन्तव्य तक पहुच गए ! अन्य उत्सुक लोगो की तरह हमे भी प्रवेश टिकेट के लिए पन्द्रह मिनट की प्रतीक्षा करनी पड़ी और लम्बी कतार देखकर यह आश्चर्य भी हुआ की भारत में आज भी पुस्तक मेले के लिए लोगो में कितनी उमंग और कितना उत्साह है.

          अन्दर प्रवेश पाकर हमने देखा की पुस्तको का यह विशाल समुन्द्र लगभग पांच भागो में बंटा हुआ था ! वहा हिंदी और अंग्रेजी की पुस्तको की अलग व्यवस्था थी और उन्हें नाम भी इन्ही के अनुरूप हिंदी-हॉल, अंग्रेजी-हॉल आदि दिए गए थे किन्तु न जाने क्यों मुझे ये वर्गीकरण थोडा साम्प्रदायिक सा लगा क्योंकि भाषाएँ तो जनमानस के आम संवाद का माध्यम है फीर इन्हें ऐसे नाम दिया जाना जरूरी तो नहीं.

          वहा कई प्रकार की पुस्तके, उनके विषय, उनके रंगीन और आकर्षण से भरे हुए आवरण वहा आने वाले पुस्तक प्रेमियों का अनायास ही दिल जीत रहे थे ! यहाँ हर वर्ग से सम्बन्धित पुस्तके उपलब्ध थी ! कोई कुछ देर पढ़कर, पन्ने पलटकर अनायास ही आगे बढ़ जाता तो कोई पसंदीदा पुस्तक मिलने पर खरीद भी लेता था ! हमने भी निबंध और सामयिक विषयों की चार-पांच पुस्तके खरीदी ! इस दौरान पिताजी और माताजी के कई परिचित और हमारे सहपाठी भी वहा मिले और कभी अभिवादन तो कभी गप-शप का यह सिलसिला पूरी प्रदर्शनी में रह-रहकर चलता ही रहा.

          आगे चलने पर हमने देखा कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनुसार एक अलग ही मंडप बना हुआ था ! इसमें हमारे देश के सभी क्षेत्रो के रंग-रूप, आचार-व्यवहार, बोली-भाषा और वेश भूषा का अनूठा संगम था ! यहाँ भिन्न-भिन्न पहनावे वाले वस्त्रो जिनमे बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब और उत्तरी भारत का समन्वय था ! इस विविधता में एकता देखकर हमे सचमुच में भारतीय होने का महत्व पता लगा और हमारे देश की अनूठी परम्पराओ, सभ्यता और संस्कृति के प्रति गर्व महसूस हुआ.

          बच्चो की पुस्तको वाले स्टाल पर सबसे ज्यादा भीड़ लगी हुई थी ! बच्चो के लिए कई प्रकार की रंगीन पुस्तके प्रकाशको द्वारा बेचीं जा रही थी ! इनमे से दो तो अत्यंत ही सस्ती दरो पर वे किताबें दे रहे थे और वैसे भी यह पुस्तक-मेला बच्चो के बाल-साहित्य को ही समर्पित किया गया था.

          दो से तीन घंटे की इस चहल-कदमी से हमारा शरीर भी विश्राम मांग रहा था ! इसलिए हमने हॉल से बाहर जाकर नाश्ता करने का निश्चय किया ! इस प्रकार गरम समोसे और चाय पीकर हमने स्वयं को तरोताजा किया ! और इसके बाद कुछ देर वही बैठकर आराम भी किया.

          अंत में हम विदेशी पुस्तको वाले मंडप पर पहुचे ! यहाँ दुनिया हर की भाषाओ तथा उन्हें बोलने वालो का बहुत ज्यादा मिश्रण था ! यहाँ रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, चीन, जापान आदि कई देशो के रंगीन स्टाल और झंडे लगे हुए थे ! यहाँ भीड़ तो कम ही थी किन्तु इन किताबो की बिक्री अधिक मात्रा में हो रही थी ! ऐसा लग रहा था की यहाँ के ज्ञानी लोगो में भारत के पुस्तकालय की किसी भी पुस्तक का पढ़ा जाना शेष ही नहीं रह गया हो या फिर उनकों भारतीय साहित्य को जानकर अब विदेशी साहित्य और विदेशी पुस्तको से विशेष लगाव हो गया हो.

          किताबो के इस विशाल सागर को देखते और कुछ को पढने और समझने में कब शाम हो गयी इसका पता ही नहीं चला ! मैदान के कई चक्कर लगाने के बाद हमारे पैर भी थक चुके थे ! शरीर घर जाने की मांग लगातार कर रहा था पर मन कह रहा था की एक आखिरी चक्कर और लगा लिया जाये ! आखिर हम भी पुस्तको का ढेर उठाये मैदान से बाहर आ गए.

          Ganga pollution short essay in hindi - गंगा-प्रदूषण पर निबंध?

          भारतवर्ष में गंगा केवल मात्र एक नदी नहीं होकर सम्पूर्ण भारतीयता का और यहाँ के जनमानस की आस्था का प्रतीक है ! हिमालय की गोद से निकल कर मैदानी क्षेत्रो तक इसका मोक्ष देने वाली नदी के नाम पर परिचय दिया जाता है ! जीवन में एक बार स्नान किया जाना तो धार्मिक द्रष्टि से अत्यंत ही आवश्यक माना गया है ! भारतीय परम्परागत सभ्यता-संस्कृति का क्रमबद्ध विकास क्रमश: गंगा-यमुना जैसी नदियों के तट पर हुआ.

          इसके जल का महत्त्व इतना है की वर्षो तक डिब्बा-बोतल आदि में बांध रखने पर भी वह ख़राब नहीं होता और ना ही उसमे किसी प्रकार के कीड़े आदि लगते है ! भारतीय जन-जन की आस्था का केंद्र गंगा को केवल एक सामान्य नदी नहीं मानकर इसे शास्वत माँ, वैतरणी, मोक्षदायिनी आदि की संज्ञा दी गयी है ! तथा इसकी हिन्दू धार्मिक ग्रंथो में इसकी उत्पत्ति श्रष्टि के संहारक देवता शिव की जटाओ से मानी गयी है. पौराणिक कथाओ के अनुसार इसे प्रथ्वी पर लेन वाला भागीरथ था अत: इसका एक नाम भागीरथी भी मन गया है ! इतना महत्व होने पर भी इसके वर्तमान अस्तित्व को लेकर कुछ विषमताए भी है.

          गंगा-प्रदूषण के प्रमुख कारण:-

          हाल ही में किये गए एक वैज्ञानिक परिक्षण और अनुभव के आधार पर कुछ शोध बताते है की धीरे-धीरे गंगा का जल अशुद्ध हो रहा है और इसकी पवित्रता दिनों-दिन समाप्त होती जा रही है ! यह पवित्र नदी अब लगातार प्रदूषित होकर गंदे नाले का रूप लेती जा रही है ! इसके किनारों वाले शहरों में आबादी का दबाव अत्यधिक बढ़ने से मल-मूत्र की गंदगी और अन्य गंदे पानी आदि के निकास की उचित व्यवस्था नहीं होने से उसे पास ही की नित्यावाही नदी में छोड़ा दिया जाता है जो या तो मुख्या रूप में गंगा ही है या उसकी सहायक नदी है जो आगे जाकर गंगा में मिल जाती है ! कई जगह कारखानों का रसायनयुक्त विषैला जल भी इसमें आकर मिल रहा है ! खेतो में किये जाने वाले यूरिया, फास्फेट आदि खाद पदार्थो का जल भी अधिक वर्षा होने पर इसी में आकर मिल रहा है ! गंगा के घाटो के किनारे किये गए दाह-संस्कार, प्लास्टिक का लगातार बढ़ता प्रयोग भी इसके प्रदूषण के स्तर को बढा रहे है ! कई क्षेत्रो में तो जल-दाह के नाम पर समूची लाशें ही इसमें बहा दी जाती है ! मर्तको की अस्थिया, मृत-शिशु, संक्रमित और बाढ़ का कचरा, म्रत आवारा पशु आदि भी इसको प्रदूषित करने के अन्य कारण है.

          गंगा-प्रदूषण के निवारण के उपाय:-

          गंगा को प्रदूषित होने से बचाना समाज और सरकार दोनों का संयुक्त काम है और दोनों के सामंजस्य से ही इस क्षेत्र में सफल प्रयास किये जा सकते है ! इसका कटाव रोकने को दोनों किनारों पर किया गया वर्क्षो का लगातार कटाव रोकना होगा और स्थानीय लोगो को जाग्रत करना होगा ! सरकार को शोधक संयत्र आदि लगाकर कारखानों के रसायन के निस्तारण के लिए अन्य विकल्प तलाशने होंगे ! समाज को भी विधुत शव-दाह गृह आदि नई तकनीक अपनाकर परम्परागत तरीके का त्याग कर इसका प्रदूषण रोकना होगा ! इसके स्थायी समाधान के लिए सरकार को न केवल कागजो में बल्कि धरातल पर स्थायी और प्रभावी योजनाये चलानी पड़ेगी साथ ही प्रदूषण करने पर उचित दण्ड और जुर्माने की व्यवस्था कठोरता से लागु करनी पड़ेगी ! लोगो को रासायनिक के प्रयोग के स्थान पर जैविक क्रषि की प्रणाली अपनानी पड़ेगी ! इसके क्षेत्रीय किनारों पर बसने वाली स्थानीय जनसँख्या को इसका महत्त्व समझाना होगा और उनके रोजगार के लिए ऐसी अन्य व्यवस्था करनी पड़ेगी जिससे उनका जीवन-निर्वाह भी होता रहे और गंगा भी प्रदूषित नहीं हो ! कचरों के संग्रह केंद्र बनाकर उनके शोधन की व्यवस्था लागु करनी होगी ! परिवर्तन के इस दौर में आम जनता को भी आधुनिक और वैज्ञानिक द्रष्टिकोण अपनाना होगा ! अन्य सभी कारण जिनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में इसका प्रदूषण बढ़ रहा है उनके निराकरण की व्यवस्था समाज और सरकार को मिलकर करनी होगी.

          उपसंहार:-

          गंगा के जल का शुद्ध होना एक तरह से सम्पूर्ण भारतीयता की शुद्धता करना ही कहा जा सकता है क्योंकि देश के प्रमुख शहरों में बहने वाली गंगा भारत को मोक्ष देने वाली नदी बताई गयी है देश का हिन्दू वर्ग तो अपने जीवन में हरिद्वार स्तिथ गंगा-स्नान को सर्व श्रेष्ठ तीर्थ समझता है ! उद्गम स्थल गंगोत्री से लेकर समस्त भारत में इसके जल की पवित्रता का महत्व किसी से छिपा हुआ नहीं है ! यह कई प्रकार की आयुर्वेदिक ओषधियों में भी प्रयुक्त होता है ! प्रत्येक हिन्दू के पूजा-घर में इसका अनिवार्य स्थान है ! इस प्रकार भारतीयता और उसकी अनन्त काल से चली आ रही सभ्यता-संस्कृति को अक्षुण बनाये रखने के लिए गंगा का प्रदूषण समाप्त किया जाना अत्यंत ही आवश्यक है ! लगातार जा रहे विषैले जल को इसमें मिलने से रोकना होगा तभी इस नदी का पवित्र रूप हम भावी पीढियों को दे सकेंगे.

          female foeticide meaning in hindi - कन्या भ्रूण हत्या पर निबंध?

          पुरुषो के प्रति महिलाओ के गिरते लिंगानुपात के ताज़ा नतीजो से पता चला है की सारे देश में ही बेटियों की संख्या में उतरोत्तर कमी आती जा रही है ! स्त्री-पुरुष में अंतर और बढ़ता ही चला जा रहा है ! और जनसंख्या के इस बढ़ते असंतुलन का एक ही कारण है वह है – भ्रूण हत्या ! विज्ञान की तकनीक से इंसान ने जन्म से पहले माँ के गर्भ में ही होने वाले बच्चे का लिंग पता करने का तरीका खोज कर इसके लिए राह आसान कर ली ! इस सामाजिक विक्रति ने आधुनिक युग में जन्म लिया और लगातार विकराल ही होती चली गयी ! भ्रूण हत्या आजादी से पूर्व इतनी विकराल नही थी क्योंकि तब ऐसी तकनीक या इसका इतना प्रचार नहीं हुआ करता था ! आंकड़े बताते है की देश में यह स्थिती बिगड़कर गंभीर बन चुकी है और देश में प्रति पुरुषो के प्रति महिलाओ की संख्या 2001 की जनसँख्या की गणना के अनुसार घटकर सिर्फ 933 ही रह गयी है ! पिछले हर दशक में यह नकारात्मक परिवर्तन आया है और आज भी लगातार बढ़ता ही जा रहा है.

          भ्रूण हत्या के कारण:-

          हमारी परंपरागत सोच ही भ्रूण-हत्या का प्रमुख कारण है ! जैसे बेटा नहीं होगा तो वंश कैसे चलेगा, बुढापे में रोटी कोन देगा , चिता में आग कोन लगाएगा –आदि ! इन अनैतिक तर्क के आधार पर हमारी इस निम्न स्तर की सोच को बल मिला और वो भूल गए की बेटी हुई तो वह अन्तरिक्ष में जाने वाली कल्पना चावला या फिर देश की पहली महिला आर ए एस ऑफिसर किरन बेदी भी बन सकती है ! परन्तु न ही तो हमारी सोच बदली और न ही वर्तमान में बदलती हुई दिख रही है ! लोगो का तेजी से गिरता आर्थिक स्तर, रोजगार के सद्जनो में कमी और तेजी से बढती महंगाई भी इसका प्रमुख कारण है ! आज देश में केरल ही एकमात्र ऐसा राज्य बचा है- जहा पुरुषो के मुकाबले महिलाओ की संख्या अधिक या कहा जा सकता है की संतोषजनक है ! अन्यथा भ्रूण हत्या की वजह से लगभग पूरे देश में ही एक ही स्थिती बन चुकी है ! जन्म से पूर्व गर्भपात करना और बालिकाओ का अच्छी तरह लालन-पालन नहीं करना उन्हें शिक्षा से वंचित रखना या लड़का-लड़की में माँ-बाप द्वारा भेदभाव करना भी इसकी समस्या की प्रमुख वजह है.

          भ्रूण हत्या से बढ़ता असंतुलन:-

          एक औसत के अनुसार देश में प्रतिवर्ष लगभग 50000 गर्भपात कराये जा रहे है यदि देश में जनसंख्या के असंतुलित होने की यही स्थिती बनी रही तो फिर बेटी न होने से भाई की कलाई सुनी रहेगी, हमारे बेटो के लिए बहु नहीं मिलेगी और गंभीर प्रश्न तो ये है की अगली पीढ़ी ही देखने को कैसे मिलेगी क्योंकि कोख का अधिकार और माँ बनने का अधिकार तो प्रक्रति ने नैसर्गिक रूप से सिर्फ स्त्री को ही प्रदान किया है ! हमारी आज की बेटी को जीवन, शिक्षा, चिकित्सा की उचित सुविधा दिए बिना अगली पीढ़ी की कल्पना करना भी व्यर्थ ही है ! अल्ट्रासाउंड की जो तकनीक विज्ञान में चिकित्सा जगत की क्रांति के रूप में सामने आई थी उसे कुछ असामाजिक और अनैतिक तत्वों ने बेटियों के लिए ही इस क्षेत्र की सबसे बड़ी बाधा बना डाला.

          जनसंख्या पर इसके प्रभाव:-

          बेटी की हत्या चाहे वो जन्म के पहले हो या बाद में- यह एक अपराध ही है ! 1901 में लिंगानुपात का यह आंकड़ा 972 था जो आजादी के बाद भी लगातार बढ़कर 2001 में 933 तक आ गया ! इससे लोग लड़का-लड़की में भेदभाव कर रहे है, अंतरजातीय विवाह भी बढ़ रहे है ! लोगो को स्त्री धन तो चाहिए पर बेटी के नाम पर नहीं बल्कि बहु के नाम पर ! कई समाजो में तो यह स्थिती विकट रूप ले चुकी है और विवाह योग्य उम्र हो जाने पर भी कई लडको के किये वधु नहीं मिल पा रही है ! और लोग बेटी के बदले अपने परिवार के लिए बहु तलाश रहे है.

          उपसंहार:-

          समस्या की गंभीरता को देखते हुए समाज और सरकार दोनों को इसके लिए मिलकर कदम उठाने होंगे ! शादी-जन्म-म्रत्यु और गर्भ धारण को रजिस्टर करना होगा, महिलाओ में अधिक से अधिक चेतना लानी होगी क्योंकि कई मामलो में गर्भपात के लिए प्रेरित करने वाली भी स्त्री ही है ! सरकार को कड़े कानून बनाकर उनके लिए सजा का प्रावधान करना होगा ! स्वयं सेवी संगठनो को सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम चलाने की आवश्यता है ! इसके लिए चोरी-छिपे भ्रूण जाँच करने वाले डॉक्टर और चिकित्सा विभाग के अन्य कर्मचारियों पर तुरंत प्रभाव से रोक लगनी होगी और अपराधी के रूप में उन पर मुकदमा चलाकर उन्हें सजा के दायरे में लाना होगा ! समय रहते इस गंभीर समस्या के हम सब ने मिलकर प्रयास नहीं किये तो यह हमारी सामाजिकता के लिए ही सबसे बड़ा खतरा बन जाएगी.

          short essay on "dowry system" in hindi - दहेज़ प्रथा पर निबंध?

          दहेज़ प्रथा को हमारी सभ्यता और सामाजिकता पर कलंक माना गया है ! ग्रामीण क्षेत्रो से अधिक शहरी क्षेत्रो में यह समस्या है क्योंकि धनाढ्य वर्ग में इसकी अधिक सक्रियता पाई गयी है! वर्तमान में यह लगभग सर्वसमाजो की एक प्रमुख समस्या बन गयी है ! इस बुराई से अब तक देश में न जाने कितनी आत्म-हत्याएं और हत्याए हुई , कितने घर बर्बाद हुए और आज के शिक्षित और सभ्य समाज में भी ये अनवरत रूप से जारी है ! आज भी समय-समय पर आग लगाकर, फांसी लगाकर या अन्य तरह से की गयी आत्म हत्या आदि इस कुरीति से सम्बन्धित घटनाये समाचार-पत्रों में देखने और पढने को मिलती है ! देश के कई पिछड़े क्षेत्रो में तो यह समस्या विकराल रूप ले चुकी है जहा शिक्षा का अभाव है.

          दहेज़ प्रथा का परिचय:-

          विवाह के साथ ही विदा के समय अपनी पुत्री को दिए गए सामान को दहेज़ की संज्ञा दी जाती है ! इनमे से कुछ तो माँ-बाप अपनी हैसियत के अनुसार प्रसन्नता से देते है किन्तु कुछ दहेज़ के लोभी और स्वार्थी तत्व जो ससुराल पक्ष में महिलाओ का रिश्तों की आड़ में अनुचित रूप से शारीरिक और मानसिक उत्पीडन करते है और बहु को आजीवन पीहर पक्ष से कम दहेज़ देने या फिर और पैसा मंगाने के नाम पर नाजायज परेशान करते है तब यह स्तिथि दहेज़ प्रथा का रूप धारण कर लेती है और समाज में धारणा बन जाती है की शादी में बेटी को यह सब वस्तुये तो देनी ही चाहिए अन्यथा ससुराल पक्ष उसे अनावश्यक रूप से तंग करेगा और उनकी बेटी का वैवाहिक जीवन खुशहाल नहीं बनेगा ! दहेज़ की सामाजिक बुराई को घर-परिवार के ही अनपढ़ और निम्न स्तर के विचार रखने वाले कुछ संकीर्ण सोच वाले रूढ़िवादी लोगो से बल मिला है.

          दहेज़ प्रथा के प्रमुख कारण:-

          अशिक्षा, बेरोजगारी, विलासितापूर्ण जीवनशैली, महंगाई, अनावश्यक खर्चे आदि कई मुख्य और गौण कारण इस सामाजिक बुराई में छुपे हुए है ! कई मामलो में शिक्षा के अभाव में अज्ञानतावश यह स्तिथि बनती है तो कई बार आज की विलासिता युक्त जीवनशैली से प्रभावित होकर ऐसी घटनाए घटित होती है क्यूंकि मज़बूर होकर व्यक्ति फैशन के नाम पर तो कई बार शौक पुरे करने के उद्देश्यों से अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों का अनुसरण करने लगता है ! कई बार अपने कार्य क्षेत्र की अनिश्चितता या फिर बेरोजगारी की वजह से उसकी आर्थिक स्तिथि खराब होती चली जाती है और निर्भरता के इस स्तर तक आते-आते उसे धन की व्यवस्था का यह तरीका सबसे आसान लगने लगता है ! वास्तविक स्तिथि समझ में आने तक सब कुछ उसके हाथ से निकल जाता है और इस स्तिथि से उबरने लिए वह स्वयं तथा अन्य पारिवारिक सदस्यों की सहमति से पत्नी पर पीहर पक्ष की और से कम दिए गए धन का आरोप लगाने लगता है और दबाव बनाने लगता है.

          दहेज़ प्रथा के निवारण के उपाय:-

          दहेज़ जैसी दानवीय प्रथा से निपटने के लिए हमे बचपन से ही हमारे बच्चो में नैतिक शिक्षा जैसे गुणों का महत्व समझाना होगा ! स्वयं को भी कई प्रकार से चरित्र में सुधार लाकर कर्मठ और अधिक मेहनती बनना पड़ेगा साथ ही आमदनी के अन्य विकल्प तलाशने होंगे जिससे घर की आरती स्थिती सुधरे और ऐसी अनावश्यक परिस्तिथिया घर में बने ही नहीं, घर-परिवार बर्बाद न हो! साथ ही घर के बुजुर्गो को भी अपनी आदतों में सुधार लाकर धैर्य संयम और सहनशीलता के गुणों का परिचय देना पड़ेगा ! देश की सरकार को भी सख्त कानून बनाकर और पिता की संपत्ति में पुत्री को भी पुत्र के समान बराबर दर्जा देना पड़ेगा और दहेज़ के लोभियों को इसकी वास्तविकता समझानी पड़ेगी ! लडको को भी स्वयं आगे आकर अपने माता-पिता की ऐसी अनैतिक मांगो का विरोध करना पड़ेगा ! मनमानी करने वाले लोगो को दण्ड दिया जाना चाहिए.

          उपसंहार:-

          वैदिक काल से ही भारतीय सामाजिक व्यवस्था में दहेज़ प्रथा जैसी कुरीति के लिए कोई स्थान नहीं था किन्तु कालचक्र के साथ ही कई व्यक्तिगत और सामाजिक कारण जुड़ते चले जाने से यह समस्या अत्यन्य जवलन्त हो गयी है ! इससे हमारी सामाजिकता का हास हो रहा है ! रिश्तों में दरारे पड़ रही है जिससे एकल परिवार बढ़ रहे है ! दहेज़ से तात्पर्य केवल विवाह के समय ग्रहस्थी के संचालन में आवश्यक वस्तुये दिए जाने से था न की घर की आर्थिक स्थिती नहीं होने पर भी सीमा से परे या ब्याज पर धन की व्यवस्था करके आजीवन कर्ज के बोझ तले दबा जाए ! आज इस प्रथा ने जघन्य रूप धारण कर लिया तथा इसका निवारण किया जाना ही दुष्कर हो रहा है ! दहेज़ प्रथा के कलंक को संयुक्त प्रथा की परंपरा वाले भारतीय समाज के माथे पर से सदा के लिए मिटा दिया जाना चाहिए ! तभी हमारी आने वाली पीढ़िया भयमुक्त और भेदभाव रहित वातावरण में जीवन के विभिन्न क्षेत्रो में अपने सोपान पा सकेंगी.

          Full essay on "rainy season" in hindi - वर्षा ऋतु पर निबंध?

          सूर्य की तपिश और गर्मी से व्याकुल समस्त भू-मंडल शांत और शीतल हो जाता है ! महीनो से प्यासी वसुधा वर्षा का प्रथम जल पाकर तृप्त हो उठती है और उसमे सोंधी खुशबू महकने लगती है ! जहा तक द्रष्टि जाए चारो और हरियाली चहक उठती है ! पुराने और पीले पड चुके पत्तो पर नई चेतना आ जाती है ! लताओं में परस्पर आलिंगन बढ़ जाता है ! बाग-बगीचों में फूल खिल- उठते है ! सरोवर जल से भर जाता है और सरिताए कल-कल कर बहने लगती है ! ऋतुओ में श्रेष्ठ वर्षा ऋतू की छवि कुछ ऐसी ही होती है ! सम्पूर्ण प्रक्रति जीवंत हो उठती है ! नदिया कई प्रकार की अठखेलिया करती हुई सागर से मिलने को चल पड़ती है.


          सम्पूर्ण वातावरण शांत और सुखद हो उठता है और समस्त पेड़-पोधे, लताये, मकान, मार्ग सब के सब के सब नवीन हो जाते है उनमे ताजगी आ जाती है ! सम्पूर्ण जगत में किसी पर्व का सा उल्लास छा जाता है ! बाग-बगीचों में सैर-सपाटे और पिकनिक का समय आ जाता है ! पेड़ो पर झूले टंग जाते है उन पर किशोर-किशोरीया झूलने लगते है ! कोयल मीठी आवाज में कूकने लगती है ! वन और उपवन में मानो यौवन आ जाता है ! पेड़-पोधो की डालिया मस्ती में झूम उठती है ! जामुन आदि व्रक्ष फलों से लद जाते है ! पोखरों में बारिश का पानी भर जाने से मेंढक टर्राकर अपनी प्रसन्नता बता रहे है ! उमड़-घुमड़ते बारिश के बादलो को देखकर मोर अपने पंख फैला देते है उनके चंद्वो की सुन्दरता देखते ही बनती है ! मछलिया जल में डूबकी लगा रही है तो बगुले पंख फडफडा रहे है ! रात में आकाश में टिमटिमाते जुगनू ऐसे प्रतीत होते है मानो बादलो से भरे आकाश में दीपावली के दीपक हो ! झींगुरो का समूह समस्त वातावरण को मंद और लयबद्ध आवाज में संगीतमय बना रहा है.

          Rainy day: in hindi literature?

          प्रकर्ति की इस अवस्था के बारे में सुमित्रा नंदन पन्त का कवि मन कह उठता है की
          –पकड़ वारी की धार झूलता है रे मेरा मन !
          एक अन्य कवि कविवर सेनापति ने तो वर्षा ऋतू को नववधु के आगमन की संज्ञा दे डाली !
          वर्षा ऋतू में काले बादलो के झुण्ड बनते-बिगड़ते रहते है और कई प्रकार के रूप धारण करते है ! श्यामल-कालिमा ओढ़े अंनत आकाश में रह-रहकर बिजली का चमकना इस द्र्श्य को और भी सुन्दर बनाता है ! कभी –कभी इंद्र-धनुष भी अपने सात रंग दिखाकर सबका मन-मोह लेता है ! छायावाद के प्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद इस मनोरम छवि को देखकर प्रकर्ति सोन्दर्य के एक लेख में लिखते है –
          “सघन वन में सुन्दर निर्मल जल से आच्छादित नदियों का छिपते हुए बहना प्रकट रूप में वेग सहित मानो ह्रदय की चंचल धारा को भी अपने साथ बहाये लिए जाता है“
          मंद-मंद चलती शीतल पवन में सावन की फुहारे मन को बहुत सुहाती है !
          रात्रि में गिरने वाली हल्की-हल्की बर्फ़ की बुँदे ओस की तरह प्रतीत होती है और सम्पूर्ण वसुधा पर हिम की एक श्वेत चादर सी लपेट देती है ! दूर तक सारा द्रश्य हमें दूध के समुद्र के समान दिखाई देने लगता है ! नेत्रों को ऐसा नयनाभिराम द्र्श्य देखकर अपार आनंद की अनुभूति होती है.

          Heavy Rain effect on human life?

          किन्तु कई क्षेत्रो में वर्षा का जल अत्यधिक मात्रा में गिरने से स्तिथि अत्यंत कष्टदायी भी बन जाती है और जल प्रलय का द्र्श्य बन जाता है ! कई निचले क्षेत्रो में मकान, सड़क, वाहन, पेड़-पोधे सब जलमग्न हो जाते है ! सैंकड़ो पशु-पक्षी काल का ग्रास बन जाते है ! अपने स्वाभाविक आश्रय स्थल को छोड़कर उन्हें शरण के लिए अन्यत्र स्थानों पर जाना पड़ता है ! प्रक्रति के प्रकोप से विवश मानव की स्तिथि बताते हुए प्रक्रति चित्रण के कुशल छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में लिखा है-

          हिमाद्रि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाह,
          एक पुरुष भीगे नयनो से देख रहा था प्रलय-प्रवाह,
          ऊपर हिम था निचे जल था अत्यंत सघन
          एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन.

          सड़को और झोपड़ियो में अपना जीवन-व्यतीत करने वाले गरीब, असहाय लोगो को भीगे हुए वस्त्रो में ही अपना समय गुजारना पड़ता है ! जल का उचित निकास नहीं होने से उनका इंतज़ार और बढ़ जाता है, भोजन-वस्त्र-आवास आदि की परेशानी होने से उनके सामान्य जीवन चक्र में विराम लग जाता है और बैठने, सोने, और आजीविका के कार्य करने में परेशानिया आ जाती है! मच्छर-मक्खी आदि कई प्रकार के कीटो के संक्रमण से गंभीर बिमारियों के फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है ! डायरिया, वायरल-फीवर, मलेरिया और टाई-फाईड जैसी बीमारी तो इस ऋतू के साक्षात् अभिशाप ही माने गए है ! इस प्रकार हमारे मानव जीवन पर वर्षा ऋतू के मिश्रित प्रभाव पड़ते है और कुछ आधारभूत संरचनाओ को सुधार कर हम इस ऋतू की सुन्दरता को और सार्थक बना सकते है.

            Importance of education short essay in hindi - शिक्षा के महत्त्व पर निबंध?

            शिक्षा ही अपने ज्ञान को बढाने का सबसे बेहतर साधन हो सकता है ! यह हमारे सांस्कृतिक जीवन का भी माध्यम है ! यह हमारे चरित्र का निर्माण करती है और जीवन यापन के तौर-तरीके सिखाती है ! शिक्षा के बल पर ही व्यक्ति अपनी क्षमताओ की परख करते हुए उनका उपयोग कर पाता है ! वह जीवन जीने की इस आवश्यक कला के साथ अपने चरित्र का विकास कर पाता है ! मानव के विकास को ज्ञान के आधार पर नापा गया है क्योंकि ज्ञान ही हमारी बुद्धि को प्रशिक्षण प्रदान करता है इससे हमारे मस्तिष्क में नित नए विचार जन्म लेते है और कई प्रकार के उपाय, आविष्कार और खोज होती है ! इस प्रकार मानसिक हो या शारीरिक, सांसारिक-संकट हो या प्राक्रतिक आपदा सदैव ज्ञान ही हमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हमारे विवेक का दर्शन कराता है और उचित निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है.


            Education: As Knowledge?

            ज्ञान प्राप्त करना शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य है ! आज की हमारी फली –फूली सभ्यता का माध्यम ज्ञान के माध्यम से प्राप्त की गयी शिक्षा ही है ! शिक्षा हमें हमारी संस्कृति का ज्ञान कराती है जिससे मानव में सभ्यता तथा शिष्टता आते है वो साहित्य, संगीत ,कला आदि अन्य क्षेत्रो में नए-नए आयाम छु पाता है ! इस तरह एक और तो उसके जीवन स्तर में सुधार आता है तो वही दूसरी और वह नैतिकता जैसे जीवन के आवश्यक मूल्यों को भी समझ पाता है और आने वाली पीढ़ी के लिए वह धरोहर बिना किसी विशेष जतन के स्वत: ही संरक्षित हो जाती है.

            Education: For a Character?

            चरित्र से मतलब उन सभी बातो से लिया जा सकता है जो हमारे व्यवहार और आचरण में प्रयोग में लायी जाती है या जो हम अपनी और से दुसरो के विरुद्ध प्रयोग में लाते है ! इसकी परिभाषा देते हुई pluto ने कहा है की ‘चरित्र केवल सुदीर्घकालीन आदत है ‘ अर्थात जिन अच्छी आदतों को आपने आजीवन बनाये रखा उसे चरित्र कहा जा सकता है ! संस्कृत रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि ने भी कहा है की ‘मनुष्य का चरित्र आपको बता देता है की वह वीर है या कायर, कुलीन है या अकुलीन और पवित्र है या अपवित्र ! चरित्र को अच्छे और बुरे दो भागो में विभाजित किया जा सकता है ! अच्छा चरित्र हमारे समाज की शोभा है, अन्य लोगो के लिए अनुकरणीय आदर्श है और शिक्षा ही इसकी दिशा तय करती है ! गाँधी जी ने भी कहा है की चरित्र की शुद्धी ठोस शिक्षा की ही बुनियाद है ! चरित्रहीन आदमी केवल ज्ञान का भार वहन करता है जब तक की उसमें नैतिकता के गुणों का समावेश नहीं हो ! इस प्रकार शिक्षा मानव चरित्र में विधमान उसके समस्त सद्गुणों ओर पूर्णत्व का विकास करती है.

            Education: For Profession?

            व्यवसाय का मतलब है -जीवन निर्वाह का साधन ! आपकी शिक्षा में इतनी शक्ति तो होनी ही चाहिए की वह जीवन के निर्वाह का साधन बन सके दुसरे शब्दों में उस शिक्षित व्यक्ति की रोजी-रोटी की गारंटी ले सके ! इसे विस्तृत रूप में समझने के लिए गाँधी जी का एक कथन प्रशंसनीय है – सच्ची शिक्षा बेरोजगारी के विरुद्ध बीमे के रूप में प्रयुक्त होनी चाहिए ! यह कम से कम इतनी तो होनी ही चाहिए की की आपको आजीवन जीविका के उपार्जन में सफलता दिला सके और इस क्षेत्र में चिंता से मुक्त रखे.

            Education as a Art of Life?

            जीवन को कुशलता से जीने के लिए आपको जीवन जीने की कला भी आनी चाहिए ! जिससे हमें जीवन की समस्त जटिलताओ, दुखो:, विप्पतियो से निपटने की और उनके सम्बन्ध में निर्णय लेने की क्षमता प्राप्त हो सके ! इसके अंतर्गत एक परिवार चलाने से लेकर उसके सामजिक और आर्थिक सम्बन्ध को विकसित करने वाली सभी क्रियाये आ जाती है ! इन क्रियाओ में सफल हो जाने से व्यक्ति में आत्मविश्वास आ जाता है और वह आने वाले जीवन के लिए भी हर तरह से तैयार हो जाता है.

            Education as a Personality Development?

            महादेवी वर्मा ने कहा है की –शिक्षा व्यक्तित्व के विकास के लिए भी है और जीविकोपार्जन के लिए भी ! इस कथन से शिक्षा का उद्देश्य दोहरा हो जाता है ! स्वाधीन भारत में विधार्थी वर्ग को सबसे अधिक आवश्यकता चरित्र के निर्माण की थी जो उनके व्यक्तित्व के विकास से ही संभव थी ! सामाजिक जीवन में सबको जीविका के उपार्जन की क्षमता तो प्राप्त करनी ही थी ! इन दोनों ही लक्ष्यों का त्याग करने से शिक्षा समय बीताने का साधन हो गयी और इस वास्तविकता का पता उन्हें तब चला जब तक शिक्षा के सारे सोपान प्राप्त कर लिए गए ! इन सबसे आज के विधार्थी का आचरण भी प्रभावित हो गया इससे आजीविका का लगातार अभाव होता चला गया और उसकी स्तिथि परजीवी के समान हो गई वह सामाजिकता से विमुख ही होता चला गया.

            short essay on "importance of women" in hindi - नारी का महत्त्व?

            छायावाद के प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंद पन्त ने नारी शब्द को देवी, माँ, सहचरी और सखी कहकर उसका महत्व बताया ! नारी के प्रति उनके महान शब्द है –यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ! नारी ही इस संसार का मुख्य उद्गम स्त्रोत है ! देवता हो या मानव नारी ही किसी न किसी रूप में जन्म देने वाली बनी है ! हमारे घरो का मुख्य आधार भी नारी ही है ! जब तक किसी घर में नारी का प्रवेश नहीं हो जाता वह घर सही मायनों में घर नहीं कहलाता है.

            भारतीय संस्कृति में तो कोई भी यज्ञ, तीर्थ, जप, दान, या अनुष्ठान बिना नारी के अधूरा ही बताया गया है ! नारी जीवन है, आधार है और सम्पूर्ण विश्व को द्रष्टिगोचर रखते हुए इस पर पूरा का पूरा एक ग्रन्थ ही लिख दिया जाये तब भी नारी की महिमा का वास्तविक बखान कर पाना शायद संभव नहीं हो पायेगा ! स्रष्टि की उत्पत्ति के समय से ही नर और नारी एक दुसरे के पूरक है और आज भी समाज नाम की इस गाडी के दो जरूरी पहिये है ! कई बार इसमें पुरुष प्रधान समाज की बात भी सामने आती है और नारी को अबला बता दिया गया है पर गहराई से विचार करे तो ऐसा कही भी प्रतीत नहीं होता है ! आदिकाल से नारी तो नर की अर्धांगिनी कही गयी है ! किन्तु यह भी सत्य ही है की जो महत्व नारी को समाज में मिलना चाहिए वह स्तर नहीं मिल पाया है.

            Situation of women in society

            समाज में नारी की दसा?आज के इस दौर में नारी का सम्मान लगातार कम होता जा रहा है ! उसके अधिकारों का हास हो रहा है ! आज के भोगी , लालची और स्वार्थी दानवो ने नारी को व्यतिगत लाभ के लिए कुचल दिया है नारी का महत्त्व उनके लिए नगण्य ही प्रतीत होता है ! द्वापरयुग से लेकर आज तक उसके साथ छल और भेदभाव हुआ है ! नारी ने भी पुरुष की तुलना में स्वयं में जो अंतर पाया उससे दुखी होकर स्वयं को इस दयनीय स्तिथि का कारण मान लिया ! किन्तु फिर भी उसने अपने शील का त्याग न करते हुए बाहरी जगत की इस सत्ता के विरुद्ध संघर्ष करने का निर्णय लिया जो उसकी जिजीविषा को दर्शाता है ! गार्गी, मेत्रियी तथा लीलावती आदि अपने काल की महत्वपूर्ण नारी शख्शियत रही ! इंदिरा गाँधी ने भी अपने जीवन चरित्र से नारी को सक्षम और समर्थ बताया ! पुरुष ने उसे सिर्फ मनोरंजन का माध्यम माना किन्तु कुछ साहित्यकारों ने नारी शक्ति का लगातार महिमामंडन किया ! स्त्री तो ममता की साक्षात् मूर्त है वह किसी भी रूप में असहाय न होकर दात्री ही है.

            Indian women after freedom

            आजादी के बाद की नारी?स्वाधीन होने के बाद से ही भारतीय नारी के स्तर में व्यापक बदलाव आया है ! शिक्षा के क्षेत्र में उसकी भागीदारी भी बढ़ी है ! गाँवों से अधिक शहरो में वे अपने जीवन स्तर, जागरूकता आदि के प्रति अधिक सक्रिय दिखाई देने लगी है ! आज के दौर की नारी का कार्यक्षेत्र सिर्फ घरो तक सिमित नहीं रह गया है बल्कि वे घरो से बाहर भी दफ्तरों, होटलों, अदालतों, शैक्षणिक संस्थाओ यहाँ तक की देश की संसद तक अच्छी संख्या में दिखाई दे रही है ! आज का जागरूक मीडिया भी महिला अधिकारों की बात कर रहा है तथा उनसे सम्बंधित प्रत्येक मामलो में सराहनीय भूमिका निभा रहा है ! महिला मुक्ति आन्दोलन से लेकर हर क्षेत्र तक उनमे अभूतपूर्व जागरूकता आ गयी है.

            Future of women in india

            भारत में नारी का भविष्य? लगातार परिवर्तन के स्तर से गुजर कर आज की नारी का जीवन स्तर अधिक व्यापक और प्रभावी हो गया है !सिविल सर्विसेज से लेकर देश की शीर्ष अदालतों और लोकसभा अध्यक्ष से लेकर देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति पद तक को नारी शक्ति ने सुशोभित किया है ! आज की नारी अपने आर्थिक और सामाजिक निर्णय लेने में सक्षम हुई है ! वह पुरुष के साथ कंधे से कन्धा मिलकर विकास के सभी क्षेत्रो में बराबर भाग ले रही है ! वो अपने व्यक्तित्व की छाप छोड़ रही है साथ ही परिवार में भी उनकी बात को महत्व मिलने लगा है ! कई मामलो में तो आज की नारी पुरुष को पीछे छोड़कर हर परिवार की कर्ता बन रही है जो इनकी सुखद स्तिथि को दर्शाता है ! हमारी सरकारों ने भी नारी शक्ति के इस प्रभावी रूप को समझा है ! आज लगातार बालिकाओ के शिक्षा, स्वास्थ्य की और कदम उठाये जा रहे है ! देश और राज्य सरकारे भी कई प्रकार की कल्याणकारी योजनाये इनके हित में ला रही है और उनका लगातार मूल्यांकन भी हो रहा है इससे कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध कम हुए है तथा देश में लिंगानुपात के आंकड़े भी बढ़ने लगे है ! इस प्रकार नारी की वर्तमान स्तिथि को देखते हुए कहा जा सकता है की भारतीय नारी का भविष्य अत्यन ही उज्जवल है.

              short essay on "my favorite book" in hindi - मेरी प्रिय पुस्तक पर निबंध?

              प्रस्तावना:- विश्व की प्रत्येक भाषा के साहित्य में समय-समय पर ऐसी रचनाओ का सर्जन हुआ जो आगामी काल में संसार के समस्त साहित्य-प्रेमियों तथा आम जन मानस के लिए आदर्श का पर्याय बन गयी ! आज भी जिन भाषाओ में वे रचनाये बनी थी उस क्षेत्र के लोग उन पर गर्व महसूस करते है ! तुलसीदास द्वारा रची गयी रामचरितमानस पर आज भी हिंदी भाषा से परिचित व्यक्ति गर्वान्वित होता है ! इसकी पवित्रता और आदर्श जीवन पत्रों की वजह से इसे लगभग हर हिन्दू के पूजा घर में स्थान मिला हुआ है और समस्त जनता में अमंगल की शान्ति के लिए इसका पाठ करना अनवरत जारी है.


              परिचय:- इस महाकाव्य की रचना करने वाले कवि भक्ति काल के प्रसिद्ध पुरोधा गोस्वामी तुलसीदास जी है ! विक्रम संवत १६३१ की रामनवमी को प्रारंभ हुई इस रचना ने १६३१ के हिंदी महीने मार्गशीर्ष के शुकल पक्ष में पूर्णता प्राप्त की अर्थात इसके निर्माण में कुल दो वर्ष ,सात माह और छब्बीश दिन लगे ! यह महाकाव्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन पर आधारित है और सम्पूर्ण कथा को सात कांडो में विभाजित किया गया है.

              नैतिकता और सदाचार-रामायण में राम कथा के माध्यम से कवि ने सामान्य व्यक्ति को उसके चरित्र की महानता, सदाचार आदि की मूल्यवान शिक्षा दी है ! लोक-कल्याण और सर्वजन सुखाय की भावना पर बल दिया है ! कम-क्रोध-लोभ-मोह-दम्भ से दूर रहने तथा अच्छे आचरण की अनमोल शिक्षा दी है-

              काम क्रोध मद मान न मोहा, लोभ न छोब नराग न द्रोह
              जिनके कपट दंभ नहीं माया तिनके ह्रदय बसहु रघुराया

              इस प्रकार दुसरो के प्रति हमारा व्यवहार मर्यादा युक्त श्री राम की तरह होना चाहिए न की अभिमानी रावन की तरह.
              लोक-कल्याण की भावना:- गोस्वामीजी स्वयं चाहते है की लोग उनका ग्रन्थ पढ़कर सदाचार का अनुसरण करे उनके ह्रदय की कालिमा का नाश हो तथा सहयोग, प्रेम, उदारता और उनमे विश्व बंधुत्व की भावना विकसित हो ! इससे सम्बंधित उदाहरण देखिये-
              कीरति भनिति भूति बल सोई सूख सरी सम सब कह हित कोई
              इस प्रकार उनके इस महाकाव्य का मूल प्रयोजन लोक कल्याण की भावना ही है ! तुलसी लोगो में सद्भाव और सहनशीलता लाना चाहते है ! समन्वय की भावना-सम्पूर्ण रामचरितमानस में समन्वय की ही चेष्टा हुई है ! इस ग्रन्थ के रचनाकाल में समाज में व्याप्त विषमता जैसे ब्राह्मण-शूद्र, उच-नीच,सगुन-निर्गुण,ज्ञान-भक्ति,शैव-वैष्णव का संघर्ष अपनी चरम सीमा पर था ! इनका समन्वय करने के प्रयास उनकी चौपाइयो में द्रष्टिगोचर है-
              सिव द्रोही मम दास कहावा सो नर मोहि सपनेहु नहीं भावा
              ज्ञान और भक्ति का भेद मिटाते हुए एक अन्य जगह कवि ने लिखा है की –
              भगतिहि ग्यान्ही नहीं कछु भेदा उभय हरही भवसंभव खोदा

              आदर्श-जीवन की प्रस्तुती:- अखिल रामायण ही व्यवहार का दर्पण है ! भाई-भाई का, पिता-पुत्र का, पति-पत्नी का, राजा-प्रजा का, भक्त-भगवान् का और सेवक-स्वामी का यहाँ तक की शत्रु का शत्रु से भी नीतिपरक और आदर्श यथार्त चित्रण रामचरितमानस में किया गया है ! सभी पात्रों की आदर्श स्तिथि को चरम सीमा तक ले जाया गया है ! इस प्रकार यह मानव जीवन के पथ को दीपक के रूप में प्रकाशित करता हुआ प्रतीत होता है ! इस ग्रन्थ से तुलसी को रवि अर्थात सूर्य की उपमा भी मिली है.

              रामराज्य की परिकल्पना:- तुलसीदास ने प्रेरणास्पद राम कथा के साथ ही इसे आदर्श शासन व्यवस्था के रूप में भी चित्रित किया है ! राम राज्य की कल्पना ने ऐसी शासन व्यवस्था के आदर्श स्थापित किये है ! इस व्यवस्था के सम्बन्ध में यह चौपाई उचित ही है –
              दैहिक दैविक तापा, रामराज काहुहि नहीं व्यापा
              सब नर करही परस्पर प्रीति चलही स्वधर्म निरतश्रुति निति

              इस ग्रन्थ में निति को प्रधानता देते हुए भक्ति भाव पर प्रकाश डाला गया है और बताया गया है की जो मित्र को विपत्ति में देखकर दुखी नही हो वह व्यक्ति नीच है ! हमें सदैव सत्य वचनों का प्रयोग करना चाहिए और दुसरे से वही व्यवहार करना चाहिए जो हमे उस परितिथि में स्वयं के साथ उचित लगे.

              महाकाव्यों में श्रेष्ठता:- रामचरितमानस का कथानक पौराणिक और विशाल है साथ ही इसमें काव्य के लगभग सभी गुणों का समावेश है ! भक्ति रस पर आधारित इस ग्रन्थ में श्रंगार और शांत रस की भी प्रमुखता है ! यह उद्देश्यपूर्ण रचना अवध भाषा में लिखी गयी है ! सात काण्ड में विभक्त इसकी राम- कथा में छंद और अलंकारों का उचित और सार्थक प्रयोग हुआ है ! भक्ति रस की यह श्रेष्ठ उपमा दी जाती है !

              उपसंहार:- उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है की रामचरितमानस एक अत्यंत ही उपयोगी और शिक्षाप्रद ग्रन्थ है ! भगवान् के प्रति भक्ति का भाव और इसके आदर्श जीवन की परिकल्पना प्रेरणा देने वाली है ! इसके पठन और श्रवण से आध्यत्मिक आनंद की अनुभूति होती है ! लगभग ४५० वर्ष पूर्व लिखा गया यह महान आज भी उतना ही प्रासंगिक है और आज भी लोग उतनी ही रोचकता से इसे पढ़ते और सुनते है.

                How to write "Proposal Letter" in hindi - प्रस्ताव पत्र?

                Proposal letter (प्रस्ताव पत्र) का use मुख्य रूप से दो business फर्म के बीच काम के समझौते के प्रस्ताव को लेकर होता है ! इसका प्रयोग सहमति के लिए अधिक होता है किन्तु दो company, दो wendor, या दो friend के बीच भी भविष्य के मुनाफे को देखते हुए कुछ condition के base पर इसका प्रयोग किया जा सकता है ! इस पत्र में परिस्थितयो के आधार पर वर्तमान और प्रपोजल letter के accept होने की condition को compare किया जाता है ! ऐसे letter में हम language को पूरी तरह से customize कर सकते है ! इसमें आपके विचार व्यक्त करने का तरीका महत्वपूर्ण है ! इसमें ग्रीटिंग और अच्छे title का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए और सारी basic चीजे clear बतानी चाहिए.

                Example of proposal letter

                from.....
                date......
                To.........
                Subject:- proposal letter to a friend
                dear...... (friend name)
                में .......(स्वयं का नाम) यह पत्र अपने दोस्त ,,,,,,,,,,,,(दोस्त का नाम ) को लिख रहा हु ! और अपने नए business की सुचना देते हुए उसे यह बता रहा हु ! अत: मेरी इच्छा है की आप business में मेरी मदद करते हुए भागीदार बनकर मेरी यह इच्छा स्वीकार करे !
                आप पिछले 5 सालो से मेरे अच्छे मित्र है इसलिए मुझे विश्वास है की आपकी और से इस मामले में मुझे सकारात्मक जवाब मिलेगा !
                आपका अपना,,
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