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जल संकट पर निबंध - (Water problem and solution) in hindi?

पेयजल की समस्या इक्कीसवी सदी की सर्वाधिक गम्भीर समस्याओ में से एक है ! आज दुनिया भर की अठारह प्रतिशत आबादी को पीने योग्य शुद्ध जल उपलब्ध नहीं है ! एक अनुमान के अनुसार लगभग बाईस लाख लोग तो हर साल साफ़ जल नहीं मिलने की वजह से होने वाली घातक बीमारियों से मर जाते है ! स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करके ऐसी अकाल मौतों को कुछ हद तक कम किया जा सकता है ! विकाशशील देशो में कई जगह तो स्थिती इतनी विकट है की महिलाये छह किलोमीटर तक पैदल चलकर पीने योग्य जल की व्यवस्था करती है ! स्वच्छ जल का लगभग आधा भाग कई प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारणों से प्रदूषित हो ही जाता है या फिर उचित संग्रह के अभाव में वह व्यर्थ ही बह जाता है ! राजनितिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में भी जल की स्वच्छता को लेकर विशेष प्रयास होते दिखाई नहीं दे रहे है.

पेयजल की आवश्यकता:-

जल ही जीवन की पराकाष्टा है और जल के बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है ! शरीर को स्वच्छ जल की उतनी ही आवश्यकता है जितनी प्राणवायु ऑक्सिजन और भोजन की होती है ! इसके अलावा भी क्रषि जैसे आधारभूत रोजगार के लिए विश्व भर में लगभग सत्तर प्रतिशत ताजा जल का उपयोग होता है ! वन्य जीव से लेकर वनस्पति तक जल सबकी परम आवश्यकता है ! भारत में केवल 42 प्रतिशत लोगो को ही शुद्ध पेयजल उपलब्ध हो पाता है ! शिशु म्रत्यु दर को बढाने में भी अशुद्ध जल की ही मुख्य भूमिका होती है ! इस प्रकार पानी की गुणवत्ता के आधार पर भारत का विश्व भर में बारहवा स्थान है ! आज भी विश्व के लगभग तीस प्रतिशत देश साफ़ पानी की कमी से जूझ रहे है ! वैज्ञानिको के अनुसार विश्व भर की लगभग दो तिहाई आबादी 2020 तक पिने योग्य पानी की भयंकर कमी वाले क्षेत्रो में रहने को मजबूर हो जायेगी और इसका विकल्प तलाशना भी आसान नहीं होगा.

पेयजल-प्रदूषण के कारण और निवारण:-

उचित सफाई व्यवस्था जल को प्रदूषित होने से बचाने का सबसे सरल तरीका है ! विश्व भर में सतह के लगभग सत्तर प्रतिशत भाग पर जल है किन्तु पीने योग्य जल तो सिर्फ 2.5 प्रतिशत ही है और इस स्वच्छ जल का भी दो तिहाई भाग बर्फ़ के रूप में ग्ल्येशियर में जमा पड़ा है ! इस प्रकार धरती पर पीने योग्य सुलभ जल तो मात्र 1 प्रतिशत ही आसानी से उपलब्ध है और उसका आधा भाग हमारे दुरूपयोग की बलि चढ़ रहा है ! आज उद्योगों से निकलने वाले विषैले रसायन जल को अशुद्ध बना रहे है और उसमे लगातार जहर घोलकर बिमारियों को जन्म दे रहे है ! कई प्रकार की गन्दी नालिया और संक्रमित जल का एक बड़ा हिस्सा रोज इनके माध्यम से तालाब और नदी जैसे जलस्त्रोत में मिल रहा हैं इससे जलीय जीव भी अकाल मौत मर रहे है और समुद्री क्षेत्रो में इनका खादान्न के रूप में प्रयोग किया जाना कई प्रकार की घातक बिमारियों को साक्षात् आमंत्रण है ! जलवायु परिवर्तन से प्राक्रतिक जल स्त्रोत तेजी से कम हो रहे है ! इससे पर्यावरण और स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरे भी उत्पन्न हो रहे है ! दूषित जल से सब्जी और अनाज के रूप में जहरीले तत्व हमारे शरीर में जाकर हमारा स्वास्थ्य ख़राब कर रहे है ! आज एशिया में बहने वाली नदियों में घरेलु कचरे की अधिक मात्रा होने से विश्व भर की अन्य नदियों की अपेक्षा शीशे की मात्र बीस गुना बढ़ गयी है ! संयुक्त राष्ट्र संघ की जल विकाश रिपोर्ट में भी भारत को प्रदूषित जल की आपूर्ति वाला देश बताया गया है ! हमारी त्रुटिपूर्ण सिचाई व्यवस्था से जल का उचित उपभोग नहीं हो पाता और 60 प्रतिशत तो वह भाप के रूप में उड़कर वापस समुद्र में चला जाता है ! अधिक मात्रा में अवांछित जल भर जाने से कृषि योग्य भूमि भी दलदल युक्त निम्न स्तर की हो जाती है.

उपसंहार:-

जनसंख्या के लगातार बढ़ने से और वायुमंडल में तेजी से आ रहे बदलावों के फलस्वरूप आज प्रथ्वी के मीठे पानी के मुख्य जल स्त्रोत सूखने की कगार पर है ! ओधोगिक ईकाईयों में क्लोरिन, अमोनीया जैसे हानिकारक तत्व लगातार घुल रहे है ! ये जल के माध्यम से हमारे शरीर में जाकर श्वसन, चर्म और रक्तचाप सम्बन्धी बीमारी को बढ़ावा दे रहे है ! इसके लिए सूखे और गिले कचरे का उचित निस्तारण किया जाना, हानिकारक रसायनों पर रोक लगाकर उनका अन्य विकल्प तलाशना, स्वच्छ जल का आवश्यकतानुसार उचित प्रयोग किया जाना अत्यंत जरूरी है ! साथ ही वर्षा के साफ़ जल का पर्याप्त संग्रह, सघन वृक्षारोपण और प्लास्टिक आदि हानिकारक पदार्थो पर तुरंत प्रभावी ढंग से लगाईं गयी रोक इस दिशा में कारगर सिद्ध होंगी अन्यथा पीने योग्य जल को लेकर विश्ब भर में यही स्थिती बनी रहेगी और इस दिशा में प्रयास नहीं किया गया तो यह लगातार और विकराल होती जाएगी.


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