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Short Essay on "Teachers Day" - शिक्षक दिवस की जानकारी?

हमारी सामाजिक विचारधारा को सही दिशा में क्रियाशील रखने में शिक्षको की अहम भूमिका होती है ! एक शिक्षक न केवल बच्चो को अध्यापन का कार्य करवाता है बल्कि वह देश की भावी नागरिक पीढ़ी को भी तैयार करता है ! शिक्षक राष्ट्र के निर्माण में भागीदार होते है और वे देश की संस्कृति को संरक्षण भी प्रदान करते है ! वे बालको में सुसंस्कार तो डालते ही है साथ ही अज्ञानता रुपी उनका अन्धकार भी दूर करते है ! शिक्षको के इन विशेष कार्यो और अहम भूमिका निभाने के सम्बन्ध में सम्मानित करने का जो जो दिन है उसे ही शिक्षक दिवस कहा जाता है ! हर वर्ष 5 सितम्बर को यह सभी विधालयो और विश्वविधालयो में बहुत ही उत्साह से मनाया जाता है.

डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जो की भारत के प्रथम राष्ट्रपति होने के साथ ही एक अच्छे शिक्षक भी थे ! इनके जन्म दिवस पर कई सालो से शिक्षक दिवस मनाया जाता है ! वे संस्कृत के अच्छे शास्त्री, महान शिक्षक और दार्शनिक व्यक्ति थे ! कलकत्ता के दर्शन शास्त्र विश्वविधालय में किंग जोर्ज पंचम के पद पर भी वे लगभग 1 वर्ष तक रहे थे ! लगभग 9 वर्ष तक वह काशी के हिन्दू विश्वविधालय के उप कुलपति रहे और इसी पद पर रहते हुए उन्होंने शिक्षको के लिए सम्मान करने के लिए एक विशेष दिन का विचार रखा ! उनके जीवन का अधिकतम समय भी एक शिक्षक के रूप में व्यतीत हुआ था.

आज भी स्कूल और कॉलेज में शिक्षको के मूल्यांकन और सम्मान के लिए यह एक महत्वपूर्ण दिन है ! इस दिन कई विधालयो में शिक्षण का कार्य छात्र ही देखते है और छात्र-छात्राओ के प्रति विशेष लगाव रखने वाले शिक्षको को इस दिन सम्मानित किया जाता है ! सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन को याद करते हुए उनके विचार रखे जाते है ! विधार्थियों के माध्यम से भी यथाशक्ति अपने शिक्षको को उपहार आदि दिए जाते है ! ज्ञानवर्धक प्रतियोगिताये रखी जाती है ! जीवन में शिक्षक का महत्व बताया जाता है.

शिक्षक ज्ञान की वह ज्योति है जो अन्धकार युक्त कोमल बाल मन को आलोकित कर देती है ! अध्यापक देश के बालको को साक्षर बनाने का काम तो करते ही है साथ ही विवेक का ज्ञान देकर उनका तीसरा नेत्र भी खोलते है जिससे वे बड़े होकर सही-गलत की परख कर सके और अपने निर्णय स्वयं ले सके ! इस तरह शिक्षक किसी भी देश के पूर्ण समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त करते है.

अध्यापक की महत्ता बताते हुए महर्षि अरविन्द अपनी एक पुस्तक में लिखते है की –‘ शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के उपवन के माली है वे इसमें संस्कारों की खाद देते है, अपने श्रम से सींच-सींच कर महाप्राण शक्ति बनाते है ! इटली के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार ने कहा है की शिक्षक वह मोमबत्ती है जो स्वयं जलकर दुसरो को प्रकाश देती है ! संत कबीर ने तो शिक्षक को ईश्वर से भी ऊपर दर्जा देते हुए कहा है की-

‘गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागू पाय !
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय !!

भारतीय संस्कृति में तो गुरु से आशीर्वाद लेने की अत्यंत ही प्राचीन परम्परा रही है ! अर्जुन –एकलव्य जैसे अनगिनत शिष्यों से हिंदी साहित्य का इतिहास भरा पड़ा है ! ब्रहस्पति को देवगुरु माना गया है ! गुरुकुल में अध्यन-अध्यापन की व्यवस्था आर्य कालीन सभ्यता से ही प्रचलित है ! प्राचीन काल से ही गुरु-शिष्य परंपरा को महत्व देते हुए हर वर्ष आषाड़ माह की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा की विशेष उपमा दी गयी है ! इस दिन गुरु की पूजा और सम्मान को विशेष महत्व दिया गया है.

इस प्रकार शिक्षक को आदर और सम्मान देना और उसकी कीर्ति का प्रचार –प्रसार करना हमारे देश की केंद्र और राज्य सरकार दोनों का ही मुख्य दायित्व होना चाहिए और शिक्षक दिवस इस दायित्व को पूरा करने का अच्छा दिवस है ! इस दिन स्कूल कोलेज के अलावा सरकार की तरफ से भी बड़े-बड़े आयोजन किये जाते है ! साहित्य की द्रष्टि से श्रेष्ठ शिक्षको को चयनित करके सम्मानित किया जाता है ! समय-समय पर भाषा और साहित्य के उत्सवों का आयोजन किया जाता है.

देश की राजधानी दिल्ली में भी केंद्र सरकार द्वारा और दिल्ली नगर निगम, दिल्ली नगर पालिका आदि द्वारा अपने-अपने क्षेत्रो के अधीन आने वाले स्कूलों में उनके श्रेष्ठ अध्यापकों का चयन और सम्मान भी किया जाता है ! और राज्य सरकारे भी अपने स्तर पर समय-समय पर कई शैक्षिक सम्मलेन आदि के माध्यम से शिक्षको और शैक्षणिक विषय पर कई प्रकार के वाद-विवाद प्रतियोगिता आदि का आयोजन कराती है.

इस प्रकार शिक्षक और शैक्षणिक व्यवस्था का यह क्रम बनाये रखने और शिक्षण के कार्य में और अधिक सार्थकता लाने के लिए शिक्षको का आदर-सम्मान करना, उन्हें समय-समय पर पुरस्कृत करना और उनका उत्साह वर्धन करना अत्यंत ही आवश्यक है और इसी क्रम में शिक्षक दिवस की तभी उपयोगिता भी है.


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