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��Final Ank��


short essay on "my favorite book" in hindi - मेरी प्रिय पुस्तक पर निबंध?

प्रस्तावना:- विश्व की प्रत्येक भाषा के साहित्य में समय-समय पर ऐसी रचनाओ का सर्जन हुआ जो आगामी काल में संसार के समस्त साहित्य-प्रेमियों तथा आम जन मानस के लिए आदर्श का पर्याय बन गयी ! आज भी जिन भाषाओ में वे रचनाये बनी थी उस क्षेत्र के लोग उन पर गर्व महसूस करते है ! तुलसीदास द्वारा रची गयी रामचरितमानस पर आज भी हिंदी भाषा से परिचित व्यक्ति गर्वान्वित होता है ! इसकी पवित्रता और आदर्श जीवन पत्रों की वजह से इसे लगभग हर हिन्दू के पूजा घर में स्थान मिला हुआ है और समस्त जनता में अमंगल की शान्ति के लिए इसका पाठ करना अनवरत जारी है.


परिचय:- इस महाकाव्य की रचना करने वाले कवि भक्ति काल के प्रसिद्ध पुरोधा गोस्वामी तुलसीदास जी है ! विक्रम संवत १६३१ की रामनवमी को प्रारंभ हुई इस रचना ने १६३१ के हिंदी महीने मार्गशीर्ष के शुकल पक्ष में पूर्णता प्राप्त की अर्थात इसके निर्माण में कुल दो वर्ष ,सात माह और छब्बीश दिन लगे ! यह महाकाव्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन पर आधारित है और सम्पूर्ण कथा को सात कांडो में विभाजित किया गया है.

नैतिकता और सदाचार-रामायण में राम कथा के माध्यम से कवि ने सामान्य व्यक्ति को उसके चरित्र की महानता, सदाचार आदि की मूल्यवान शिक्षा दी है ! लोक-कल्याण और सर्वजन सुखाय की भावना पर बल दिया है ! कम-क्रोध-लोभ-मोह-दम्भ से दूर रहने तथा अच्छे आचरण की अनमोल शिक्षा दी है-

काम क्रोध मद मान न मोहा, लोभ न छोब नराग न द्रोह
जिनके कपट दंभ नहीं माया तिनके ह्रदय बसहु रघुराया

इस प्रकार दुसरो के प्रति हमारा व्यवहार मर्यादा युक्त श्री राम की तरह होना चाहिए न की अभिमानी रावन की तरह.
लोक-कल्याण की भावना:- गोस्वामीजी स्वयं चाहते है की लोग उनका ग्रन्थ पढ़कर सदाचार का अनुसरण करे उनके ह्रदय की कालिमा का नाश हो तथा सहयोग, प्रेम, उदारता और उनमे विश्व बंधुत्व की भावना विकसित हो ! इससे सम्बंधित उदाहरण देखिये-
कीरति भनिति भूति बल सोई सूख सरी सम सब कह हित कोई
इस प्रकार उनके इस महाकाव्य का मूल प्रयोजन लोक कल्याण की भावना ही है ! तुलसी लोगो में सद्भाव और सहनशीलता लाना चाहते है ! समन्वय की भावना-सम्पूर्ण रामचरितमानस में समन्वय की ही चेष्टा हुई है ! इस ग्रन्थ के रचनाकाल में समाज में व्याप्त विषमता जैसे ब्राह्मण-शूद्र, उच-नीच,सगुन-निर्गुण,ज्ञान-भक्ति,शैव-वैष्णव का संघर्ष अपनी चरम सीमा पर था ! इनका समन्वय करने के प्रयास उनकी चौपाइयो में द्रष्टिगोचर है-
सिव द्रोही मम दास कहावा सो नर मोहि सपनेहु नहीं भावा
ज्ञान और भक्ति का भेद मिटाते हुए एक अन्य जगह कवि ने लिखा है की –
भगतिहि ग्यान्ही नहीं कछु भेदा उभय हरही भवसंभव खोदा

आदर्श-जीवन की प्रस्तुती:- अखिल रामायण ही व्यवहार का दर्पण है ! भाई-भाई का, पिता-पुत्र का, पति-पत्नी का, राजा-प्रजा का, भक्त-भगवान् का और सेवक-स्वामी का यहाँ तक की शत्रु का शत्रु से भी नीतिपरक और आदर्श यथार्त चित्रण रामचरितमानस में किया गया है ! सभी पात्रों की आदर्श स्तिथि को चरम सीमा तक ले जाया गया है ! इस प्रकार यह मानव जीवन के पथ को दीपक के रूप में प्रकाशित करता हुआ प्रतीत होता है ! इस ग्रन्थ से तुलसी को रवि अर्थात सूर्य की उपमा भी मिली है.

रामराज्य की परिकल्पना:- तुलसीदास ने प्रेरणास्पद राम कथा के साथ ही इसे आदर्श शासन व्यवस्था के रूप में भी चित्रित किया है ! राम राज्य की कल्पना ने ऐसी शासन व्यवस्था के आदर्श स्थापित किये है ! इस व्यवस्था के सम्बन्ध में यह चौपाई उचित ही है –
दैहिक दैविक तापा, रामराज काहुहि नहीं व्यापा
सब नर करही परस्पर प्रीति चलही स्वधर्म निरतश्रुति निति

इस ग्रन्थ में निति को प्रधानता देते हुए भक्ति भाव पर प्रकाश डाला गया है और बताया गया है की जो मित्र को विपत्ति में देखकर दुखी नही हो वह व्यक्ति नीच है ! हमें सदैव सत्य वचनों का प्रयोग करना चाहिए और दुसरे से वही व्यवहार करना चाहिए जो हमे उस परितिथि में स्वयं के साथ उचित लगे.

महाकाव्यों में श्रेष्ठता:- रामचरितमानस का कथानक पौराणिक और विशाल है साथ ही इसमें काव्य के लगभग सभी गुणों का समावेश है ! भक्ति रस पर आधारित इस ग्रन्थ में श्रंगार और शांत रस की भी प्रमुखता है ! यह उद्देश्यपूर्ण रचना अवध भाषा में लिखी गयी है ! सात काण्ड में विभक्त इसकी राम- कथा में छंद और अलंकारों का उचित और सार्थक प्रयोग हुआ है ! भक्ति रस की यह श्रेष्ठ उपमा दी जाती है !

उपसंहार:- उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है की रामचरितमानस एक अत्यंत ही उपयोगी और शिक्षाप्रद ग्रन्थ है ! भगवान् के प्रति भक्ति का भाव और इसके आदर्श जीवन की परिकल्पना प्रेरणा देने वाली है ! इसके पठन और श्रवण से आध्यत्मिक आनंद की अनुभूति होती है ! लगभग ४५० वर्ष पूर्व लिखा गया यह महान आज भी उतना ही प्रासंगिक है और आज भी लोग उतनी ही रोचकता से इसे पढ़ते और सुनते है.


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