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Introduction of "HOLI" - रंगों का त्यौहार : होली?

प्राचीन काल से ही त्यौहार भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े वाहक और संरक्षक भी बने हुए है ! त्यौहार हमारे जीवन की नीरस एकरसता को तोड़कर नयी उमंग और हर्ष का संचार करते है ! हमारे परंपरागत त्योहारों में रंगों का त्यौहार होली भी एक महत्वपूर्ण पर्व माना गया है ! इस त्यौहार में संयोग से मिलाप होने की सम्भावना अन्य पर्व की अपेक्षा अधिक होती है और मिल-जुलकर रंग आदि लगाने से यह हमारी समानता की भावना को भी विस्तार प्रदान करता है और समरसता बढ़ाता है.

हमारे देश में शायद ही ऐसी कोई तिथि है जो किसी न किसी पर्व से जुडी हुई न हो ! भारत में मनाये जाने वाले हर एक पर्व के पीछे कोई न कोई धार्मिक और सामाजिक मान्यता अवश्य ही जुडी रहती है ! होली का पर्व भी एक पौराणिक कथा से जुडा हुआ है ! ऐसी मान्यता है की हिरनकश्यप नामक राक्षस ने जब भगवान का अस्तित्व ही नकार कर अपनी प्रजा को स्वयं को ही भगवान मानने पर विवश कर दिया तब अपने ही पुत्र प्रहलाद के भगवत मार्गी हो जाने पर उसने उसे मारने के लिए कई असफल प्रयास किये और अंत में आग से न जल पाने का वरदान प्राप्त अपनी बहिन होलिका को अपने पुत्र प्रहलाद को अग्नि में लेकर बैठ जाने का आदेश दिया किन्तु भगवत कृपा से उस दिन होलिका तो जल गयी और प्रहलाद सकुशल बच गया ! तभी से इस दिन यह पर्व बुराई को आग में जला देने की मान्यता के साथ हर वर्ष मनाया जाने लगा जो आज तक अनवरत रूप से जारी है.

रंगों का यह त्यौहार अपार हर्ष और प्रसन्नता का पर्व है ! ब्रज क्षेत्र में तो यह त्यौहार एक पखवाड़े तक चलता है ! इससे पूर्व ही मंदिरों में फाग आदि के कार्यक्रम होने लगते है और सारा माहौल ही भक्तिमय हो जाता है ! लोग इस दिन पुराने वैर-भाव भुलाकर एक दुसरे के गले मिलते है और परस्पर रंग-गुलाल आदि लगाते है ! पूर्णिमा को होलिका का दहन सामूहिक रूप से किया जाता है ! इस अवसर पर महिलाए श्रृंगार कर पूजन आदि करती है.

मुग़ल बादशाहों की महफ़िलो और शायरी में भी होली का वर्णन हुआ है जिससे साफ़ प्रतीत होता है की यह पर्व मुस्लिम भी प्रसन्नता पूर्वक मानते है ! मीर, जफ़र और नजर आदि की शायरी में होली की धूम का विस्तृत उल्लेख हुआ है जो हमारी लोक परंपरा और सोहार्द का प्रतीक है ! जहाँगीर ने अपने रोजनामचे तुजुक-ए-जहाँगीरी में लिखा की हिंदी संवत्सर के अंत में यह त्यौहार आता है और इस दिन शाम को आग जलाकर दुसरे दिन उसकी राख आदि एक-दुसरे पर मलते है ! अल-बरुनी ने भी अपनी ग्यारहवी सदी की यात्रा में तात्कालिक होली का वर्णन बहुत ही सम्मान के साथ किया है और लिखा है की अन्य दिनों की अपेक्षा इस दिन विशेष पकवान बनते है और ब्राह्मणों को देने के बाद इनका आदान-प्रदान भी होता है ! मुगलों के अंतिम बादशाह अकबर शाह सानी और बहादुरशाह जफ़र तो खुले दरबार में होली खेलने के लिए अत्यंत प्रसिद्ध थे.

इस पर्व को ऋतुओ से सम्बन्धित भी बताया गया है क्योंकि इन दिनों में मौसम भी सर्दी से गर्मी की और करवट लेने लगता है साथ ही किसानो की मेहनत से तैयार की गयी खेतो में खड़ी फसल भी पक जाती है जिसे देखकर वे ख़ुशी से झूम उठते है ! गेहू की बाली को सामूहिक रूप से होली की आग में भुनकर खाया जाता है और नए अनाज आदि का आदान-प्रदान भी किया जाता है.

दूसरा दिन धुलंडी का होता है जो एक-दुसरे पर रंग डालकर मनाया जाता है ! इस दिन का विशेषकर बच्चो को बेसब्री से इंतज़ार होता है ! सुबह जल्दी ही हाथो में रंग लिए बच्चो और बड़ो की टोलिया अपना-अपना दल बनाकर गल्ली-मुहल्लों में घुमने लगती है ! एक-दुसरे को गले लगाकर, रंग-गुलाल आदि मलकर होली की बधाई दी जाती है ! रंगों से भरे गुब्बारे और पानी की पिचकारियो से रंग डाला जाता है ! ढोल और चंग बजाये जाते है और लोकगीत गाये जाते है.

दोपहर तक रंग लगाने का यह कार्यक्रम समाप्त हो जाता है और लोग नहा-धोकर नए कपडे पहन लेते है ! शाम को लोग एक-दुसरे के घर जाते है और बड़ो से आशीष लेते है ! कई जगह इस दिन शाम को मेला आदि लगता है ! कई क्षेत्रो में इस दिन दंगल-प्रतियोगिता, हास्य समेलन, मुर्ख-जुलुस आदि सामाजिक कार्यक्रम भी रखे जाते है.

होली उत्साह और उमंग का त्यौहार है ! यह हमारे सामाजिक सोहार्द का उत्तम पर्व है किन्तु कुछ लोग इस दिन मदिरा आदि का सेवन कर आपस में ही विवाद कर बैठते है जो हमारे भाईचारे और ज़ीयों और जीने दो के मूल मंत्र पर कलंक के सामान है और इस त्यौहार की गरिमा तथा मूल भावना को ठेस पहुचता है.


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