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सात बातें जो हमें जीवन में लगानी चाहिए | Best Hindi Thoughts

इस पोस्ट में आप पढेंगे कुछ ज्ञान की बातें, अनमोल वचन, हिंदी में सुविचार, सत्य वचन एक अच्छा इंसान बनने के लिए यह सब काफी रहेगा तो चलिए जानते वो अच्छी बातें क्या है.


1. ईश्वर नामका जप, स्मरण और कीर्तन करना चाहिए
2. ईश्वर नाम का सहारा लेकर पाप नहीं करना चाहिए | जो लोग ईश्वर नामकी ओटमें पाप करते है, वे बड़ा अपराध करते है.
3. (क) ईश्वर नामका साधन कर उसके बदले में संसारके भोगों की कमाना नहीं करनी चाहिए.
(ख) ईश्वर नाम-साधनरुपी धनका उपयोग पापनाश कार्य में भी नहीं करना चाहिए.
4. ईश्वर नाम को परमप्रिय मानकर उसका उपयोग उसी के लिए करना चाहिए.
5. दंभ नहीं करना चाहिए, दंभ से भगवान् अप्रसन्न होते है, दाम्भिककी बुरी गति होती है.
6. सच्चे ईश्वर भक्त, सदाचारपरायण, कर्तव्यशील होने के लिए गीताधर्म का आश्रय लेना चाहिए.
7. दुसरे के धर्म की निंदा या तिरिस्कार नहीं करना चाहिए, ऐसे झगडोंसे सच्चे सुख के साधक को बड़ा नुकसान होता है.

आइये अब इन सातों बातों का अलग-अलग विवेचन करते है:

1. जगत के ईश्वरवादी मात्र ईश्वर के नाम को मानते है, भगवान् के नाम से उसके स्वरूपकी, गुणोंकी, महिमाकी, दयाकी और प्रेम की स्मर्ति होती है, जैसे- सूर्यके उदयमात्र से जगत के सारे अंधकार का नाश हो जाता है, वैसे ही भगवान् नाम के स्मरण और कीर्तन मात्र से ही समस्त दुर्गुण और पापों का समूह तत्काल नष्ट हो जाता है, जिनके यहाँ परमात्मा जिस नाम से पुकारा जाता है, वे उसी नाम को ग्रहण करें इसमें कोई आपति नहीं. 

2. परंतू परमात्मा का नाम लेनेमे लोग कई जगह बड़ी भूल कर बैठते है, भोगसक्ति और अज्ञान से उनकी ऐसी समझ हो जाती है की हम भगवान् नाम साधन करते ही है और नाम से पापनाश होता ही है, इसलिए पाप करने में कोई आपत्ति नहीं है, यों समझकर वे पापों को छोड़ना तो दूर रहा, भगवान् के नाम की ओट या उसका सहारा लेकर पाप करने लगते है, एक मुक़दमे बाज एक नामप्रेमी भक्त को गवाह बनाकर अदालत में ले गया, उससे कहा की “देखो में जो कुछ तुमसे कहूँ, हाकिम के पूछने पर वही बात कह देना” गवाह समझा की यह मुझसे सच्ची ही बात कहने को कहेगा, पर उसकी बात सुनने पर लगा की वह झूठ कहलाना चाहता है, इससे उसने कहा की “भाई में झूठी गवाही नहीं दूंगा” मुकदमे बाज ने कहा की “इसमें आपत्ति ही कौनसी है क्या तुम नहीं जानते की भगवान् के नाम से पापों का नाश होता है तुम तो नित्य भगवान् का नाम लेते हो, भक्त हो जरा-सा झूठसे क्या बिगड़ेगा, एक ईश्वरके नाम में पाप-नाशकी जीतनी शक्ति है, उतनी मनुष्य में पाप करने की नहीं है, में तो काम पड़ने पर यों हो कर लिया करता हूँ, उसने कहा “भाई मुझसे यह काम नहीं होगा, तुम करते हो तो तुम्हारी मर्जी” मतलब यह की इस प्रकार परमात्मा के नाम या उसकी प्रर्थना के भरोसे जो लोग पापको आश्रय देते है वे बड़ा अपराध करते है, वे तो पाप करने में भगवान् नाम को साधन बनाते है, नाम देकर बदले में पाप खरीदना चाहते है, ऐसे लोगो को दुर्गति नहीं होगी तो और किसकी होगी.

3. (क) कुछ लोग जो संसार के पदार्थो की कमाना वाले है, वे भी बड़ी भूल करते है, वे भगवान् नाम लेकर उसके बदले में भगवान् से धन-सम्पति, पुत्र-परिवार, मान-बढाई आदि चाहते है, वास्तव में वे भी भगवान् नाम महात्म्यं नहीं जानते, जिस भगवान् नाम के प्रताप से उस राजराजेश्वर के अखंड राज्यका एकाधिपत्य मिलता हो, उस नाम को क्षणभंगुर और अनित्य तुच्छ भोगों की प्राप्ति कार्य में खो देना मुर्खता नहीं तो क्या है, संसार के भोग आने और जाने वाले है, सदा ठहरते नहीं, प्रत्येक भोग दुःखमिश्रित है, ऐसे भोगों के आने-जाने में वास्तव में लाभ-हानि ही क्या है.

(ख) जो लोग यह समझकर नाम लेते है की इसके लेने से हमारे पाप नाश हो जायेंगे वे भी विशेष बिद्धिमान नहीं होते है , क्योंकि पापों का नाश तो पापों के फलभोग से भी हो सकता है, जिस ईश्वर नाम से वह प्रियतम परमात्मा प्रशन्न होता है, जो नाम प्रियतम की प्रितिका निर्देशन है, उसे पाप-नाश करने में लगाना क्या भूल नहीं है, वास्तव में ऐसा करने वाले भगवान् के नाम का पूरा माहात्म्य नहीं जाते, क्या सूर्य को कहना पड़ता है की तुम अँधेरे का नाश कर दो, इसके उदय होने पर तो अंधकार के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जाता.

4. भगवान् नाम भगवत्प्रेम के लिए ही लेना चाहिए, भगवन मिले या न मिलें परन्तुउनके नामकी विस्मरति न हो, प्रेमी अपने प्रेमीके मिलने से इतना प्रशन्न नहीं होता जितना उसकी नित्य समर्ती से होता है यदि उसके मिल जाने पर कहीं उसकी स्मर्ति छुट जाती हो तो वह वही चाहेगा की ईश्वर भले ही न मिले परंतू उसकी स्मर्ति उत्तरोतर बढ़ें, उसका नाश न हो, यही विशुद्ध प्रेम है.

5. नामसाधनमें कहीं कृत्रिमता न आ जाये, वास्तव में आजकल जगत में दिखावटी धर्म-दंभ बहुत बढ़ गया है बड़े बड़े धर्मके उपदेशक न मालूम किस संसारके स्वार्थ को लेकर कौनसी बात कहते है, इस बात का पता लगाना कठिन हो जाता है, इस दंभ के दोषसे सबको बचना चाहिए, दंभ कहते है बगुला-भक्तको, अन्दर जो बात न हो और ऊपर से मान-बढाई प्राप्त करने या किसी कार्यविशेष की सिद्धि के लिए दिखलाई जाये वह दंभ है, दम्भी मनुष्य भगवान् को धोखा देने का व्यर्थ प्रयत्न कर स्वयं बड़ा धोखा खाता है भगवान् तो सर्वदर्शी होने से धोखा खाते नहीं, वह धूर्त जो जगतको भुलावे में डालकर अपना मतलब सिद्ध करना चाहता है स्वयं गिर जाता है पाप उसके चिरसंगी बन जाते है पापों से उसकी घर्णा निकाल जाती है ऐसे मनुष्य को धर्म का परं तत्व , जिसे परमात्मा का मिलन कहते है कैसे प्राप्त हो सकता है भला, अतएव इस भयंकर दोषसे सर्वथा बचना चाहिए.

6. इन सब बातों को जानकर ईश्वर का तत्व समझने और तदनुसार जगत में कर्म करने के लिए राह बतलानेवाला कोई सर्वभोम ग्रन्थ चाहिए या ऐसा कोई उपादेय सिद्ध मार्ग चाहिए, जिसपर आरूढ़ होते ही ठीक-ठिकाने से अपने लक्ष्यतक पंहुचा जा सके हिन्दुओं की द्रष्टि ऐसे चार ग्रंथो के नाम बतलाये जा सकते है, जो कल्याणके मार्गदर्शक का बड़ा अच्छा काम दे सकते है, गीता का निष्काम कर्मयोग और संख्यायोग है, यही सार्वभोम धर्म है, इसके पालन में सभी वर्ण और सभी जातियों का समान अधिकार है इसलिए-

7. किसी दुसरे धर्म पर किसी प्रकार आक्षेप न कर ईष्या, वैमनस्य और प्रतिहिंसा आदि कुभावों का परित्याग कर संसार में सबको सुख पहुचाते हुए विचरना चाहिए, जो लोग अपने धर्म को पूर्ण बताकर दुसरे धर्म की अपूर्णता सिद्ध करते है, वे वास्तव में परमात्मा के तत्वको नहीं जानते , यदि में एक धर्म का विरोध करता हूँ, उस धर्म को भला-बुरा कहता हूँ तो दुसरे के द्वारा मुझे अपने धर्म के लिए भी वैसे ही अपशब्द सुनने पड़ते है इससे में उसके साथ ही अपने धर्म का भी अपमान करता हूँ, क्योंकि ऐसा करने में मुझे अपने ईश्वरका और धर्म को सर्वव्यापी और सार्वभोम पदकी सीमा से संकुचित करना पड़ता है, किसी न किसी अंश में सभी धर्मो में परमात्मा का भाव विधमान है, अतएव किसी भी धर्म का तिरस्कार या अपमान करना अपने ही परमात्मा का अपमान करना है. अतएव जो मनुष्य धर्म के नाम पर कलह और अशांतिमूलक परस्परके कटु विवादों में न पड़कर गीताधर्म के अनुसार आचरण करता हुआ दंभरहित होकर ईश्वर का पवित्र नाम लेता है और उस नाम से पाप करने, भोग प्राप्त करने एवं पाप नाश होने की भी कमाना नहीं करता , वह बहुत ही शीघ्र काम, क्रोध, असत्य, व्यभिचार और कपट आदि सब दुर्गुणों से छुटकर अहिंसा, सत्यआदि सात्विक गुणोंसे संपन्न हो जाता है, इस लिए सबको परमात्मा के शुभ नामकी शरण लेकर स्वयं उसका स्मरण जप और कीर्तन करना चाहिए और दुसरे लोगों को प्रेमपूर्वक इस महान कार्य में लगाना चाहिए.


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