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वार्षिकोत्सव - "Annual Function" short essay in hindi?

सामाजिक जीवन में जितना महत्व किसी त्यौहार का होता है उतना ही महत्व किसी विधालय के लिए वार्षिक उत्सव का होता है ! विधालय में प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला वार्षिक उत्सव उस शिक्षण संस्था की उन्नति और प्रगति का परिचय भी देता है ! इसमें साल भर विधालय में हुई शैक्षणिक गतिविधियों का सार होता है ! यह प्रत्येक विधालय में किसी निश्चित तिथि को मनाया जाता है ! विधालय में शिक्षक और छात्र दोनों ही वर्ग इस अवसर का साल भर बेसब्री से इंतज़ार करते रहते है और किसी महत्वपूर्ण त्यौहार की तरह इसकी तैयारियां महीने भर पहले से ही शुरू हो जाती है.हमारे विधालय का वार्षिक उत्सव भी प्रतिवर्ष 15 जनवरी को मनाया जाता है ! शारीरिक क्रीडाओ और परेड में हिस्सा लेने वाले छात्र लगभग एक महीने पूर्व से ही इसकी तैयारी करने लगते है ! इसी प्रकार सांस्क्रतिक नृत्य और संगीत गायन का अभ्यास भी कई दिनों पूर्व से ही आरम्भ कर दिया जाता है ! विधालय के छात्र से लेकर प्रधानाचार्य तक इस उत्सव की तैयारी में जुट जाते है.

आखिर लम्बे इंतज़ार के बाद 15 जनवरी का वह दिन भी आ ही गया जिसका छात्रों को एक साल से इंतज़ार था ! इस दिन विधालय का सम्पूर्ण भवन किसी दुल्हन की तरह फूल और मालाओ से सजा दिया जाता है ! स्कूल के सभागार में मुख्य अतिथि और अन्य शिक्षा अधिकारियो के बैठक की व्यवस्था समुचित रूप से की जाती है ! साथ ही छात्र और उनके अभिभावकों के बैठने को अलग से कुर्सिया लगा दी जाती है ! विचार-विमर्श कर 9 बजे झंडारोहन के बाद कार्यक्रम की शुरुआत होना तय किया गया.
निश्चित समय पर मुख्य अतिथि शिक्षा मंत्री महोदय पधारे ! कुछ छात्र उन्हें सम्मान से मुख्य द्वार से अतिथि कक्ष तक लाये ! विधालय की कुछ छात्राओ ने उनके सम्मान में सुन्दर रंगोलिया बनाई और मुख्य अतिथि होने के नाते आते ही उन्हें तिलक भी लगाया गया ! इन्हें स्कूल के बैंड की धुनों से सलामी दी गयी ! एनसीसी कैडेट ने परेड से उन्हें सलामी दी ! स्कूल के प्रधानाध्यापक ने माला पहना कर उनका स्वागत किया ! इसके बाद सरस्वती वंदना और गणेश वंदना के साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत हुई ! दहेज़ की बुराई को दर्शाने वाला एक नाटक भी दिखाया गया ! एक अन्य नाटक देश प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देने की भावना पर आधारित था ! इसके मध्य में स्कूल प्रबन्धन द्वारा विधालय का पिछले वर्ष का ब्यौरा भी रखा गया ! कई शिक्षको को भी बारी-बारी से बुलाकर पुरुस्कृत किया गया ! हमारे विधालय के शाला प्रधान ने भी अपने दो शब्द कहे.
इसके बाद नृत्य और संगीत के कार्यक्रम का आरम्भ हुआ ! इसमें कुछ बच्चो की मेहनत और अभ्यास ने ऐसा समां बंधा की दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए ! हास्य कवि सम्मलेन के माध्यम से कई बाल कवियों ने सामाजिक विषमताओ पर अपनी व्यंग्य रचनाये भी सुनाई जिसे सुन-सुनकर श्रोताओ के पेट में दर्द हो उठा ! कार्यक्रमों की इस श्रंखला में शाम के चार कब बज गए इसका पता ही नहीं चला ! इसके बाद लम्बी और ऊँची कूद की प्रतियोगिता हुई ! कई छात्रों ने पिरामिड भी बनाकर दिखाये.
कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि शिक्षा मंत्री जी ने विधालय की प्रबंधन समिति, शाला प्रधान और साथ ही विधालय के छात्र-छात्राओ की भी प्रशंसा की ! उन्होंने यह कहते हुई शाला प्रधान को बधाई दी की आपका विधालय तो प्रतिभा का खजाना है ! इसके बाद शिक्षा मंत्री द्वारा दसवी और बारहवी की शीर्ष वरीयता में आने वाले छात्रों को पुरूस्कार दिए गए ! शिक्षा मंत्री ने विधालय के हित में कई घोषणाये भी की ! सबसे ज्यादा उपस्थिति और आज के कार्यक्रमों की उत्कृष्टता के आधार पर कुछ अन्य अध्यापको द्वारा भी छात्रों को कई मैडल वितरित किये गए ! साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में विशेष परिणाम प्राप्त करने वाले अध्यापको को भी विषय के हिसाब से पुरुस्कृत किया गया ! इसमें कई समाज सेवी और वरिष्ठ गणमान्य नागरिक भी पधारे हुए थे ! इसके बाद राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का कार्यक्रम भी हुआ जिसने समूचे शैक्षणिक जगत में गर्व का संचार भर दिया.
इस प्रकार लगभग दिन भर चले इस कार्यक्रम के समापन का समय नजदीक आ गया ! मुख्य अथिति को जलपान आदि की व्यवस्था भी की गई ! मुख्य अतिथि के साथ सामूहिक फोटोग्राफ भी लिए गए ! विधालय के प्रधानाध्यापक उन्हें मुख्य द्वार तक छोड़ने गए ! इसके बाद बच्चो ने भी जलपान आदि किया ! अपने कक्षा-अध्यापको के साथ उनके भी फोटोग्राफ लिए गए ! और शाम होने तक सभी अपने अपने घरो की और लोटने लगे ! इस प्रकार हमारे विधालय के वार्षिक उत्सव का समापन हुआ और कई छात्रों के मन में इस कार्यक्रम की रूप रेखा यादो के रूप में सदैव अमिट रहेगी.

    26 January (Republic Day) in Hindi - गणतंत्र दिवस की जानकारी?

    गणतंत्र दिवस अर्थात 26 जनवरी भारत में अत्यधिक राष्ट्रीय महत्व का दिन है ! क्योंकि इसी दिन सन 1950 में देश का संविधान पूर्णतया लागु हुआ था और तब से हर वर्ष यह गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है ! आजाद होने से पूर्व भी इस दिन स्वतंत्र होने की प्रतिज्ञा को दोहराया जाता था ! लेकिन अब देश के आजाद हो जाने के बाद इसे प्रति वर्ष देश की प्रगति दिखाने वाले दिन गणतंत्र दिवस के रूप में जाना जाता है और देश की रक्षा के प्रतीकों, तकनीको, आधुनिक-हथियार,रक्षा-प्रणाली सैन्य-संसाधनो आदि की विशिष्टता को भी दिखाया जाने लगा है.

    अखिल भारतीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया था की- ‘’पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करना ही हमारा धेय्य है !’ पंडित जवाहर लाल नेहरु ने रावी नदी के तट पर सर्व प्रथम तिरंगा लहरा कर यह घोषणा की थी की यदि ब्रिटिश सरकार को ओपनिवेशक स्वराज हमे देना है तो दे, अन्यथा 1 जनवरी 1930 से इसके बाद हमारी मांग पूर्ण स्वराज की होगी ! इस घोषणा के बाद कांग्रेस द्वारा तैयार घोषणा पत्र को भी सार्वजनिक रूप से पढ़ा गया.
    इसी क्रम में 26 जनवरी 1930 को तिरंगे के साथ जुलुस निकाले गए और कई सभाए भी की गयी ! यह निश्चित किया गया की जब तक हमे पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं मिल जाती हमारा यह आन्दोलन जारी रहेगा चाहे इसमें अब कितनी भी बाधा और विपदा आ जाए ! इस प्रकार आजादी को पाने की इस कोशिश में कइयो ने लाठी-गोली खाई और जान की बलि दी ! इस प्रकार कई परेशानिया पाकर आखिर 1947 में स्वतन्त्रता का सपना साकार हुआ और देश को अंग्रेजो से और इनके शासन से आजादी मिल गयी.
    1950 में जब संविधान बनकर तैयार हो गया तो इसे लागु करने की तिथि को लेकर भी काफी गहन विचार-विमर्श हुआ ! सविधान सभा के अध्यक्ष भीम राव आंबेडकर ने प्रजातंत्र शासन की घोषणा करते हुए अंत में इसे 26 जनवरी 1950 को लागु भी कर दिया गया ! इस प्रकार देश के लिए यह दिन अत्यंत महत्व रखता है क्योंकि इसी दिन सारे नागरिको को संविधान के समान अधिकार दिए गए ! संविधान में स्पष्ट किया गया की भारत अनेक राज्यों का एक संघ होगा.
    जनता में देश भक्ति की भावना जाग्रत करने और उत्साह की प्रेरणा देने के उद्देश्य से गणतंत्र दिवस के आयोजन पर केंद्र और राज्य सरकार द्वारा अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है ! जिला मुख्यालयों से लेकर हर सरकारी भवन तक इसे उत्सव के रूप में मनाया जाता है ! यह समारोह विशेष रूप से देश की राजधानी दिल्ली में विशेष मनाया जाता है ! गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश के राष्ट्रपति का देश की आम जनता के नाम सन्देश आता है ! और अगले दिन गणतंत्र दिवस को अमर जवान ज्योति के अभिवादन के साथ इस कार्यक्रम की शुरुआत होती है.
    सर्व प्रथम देश के प्रधान मंत्री द्वारा अमर जवान ज्योति का अभिवादन किया जाता है ! इसके पश्चात राष्ट्रपति देश की सेनाओ की सलामी लेने के लिए इंडिया गेट के मंच के पास आते है जहा तीनो सेनाओ के सेनापति उनका सम्मान करते है ! इसके बाद राष्ट्रपति अपना आसन ग्रहण करते है जहा उनके साथ अन्य देशो के प्रमुख भी अथिति रूप में होते है ! सैनिको को श्रेष्ठ कार्यो के लिए सम्मान दिया जाता है.
    इसके बाद गणतंत्र दिवस की मुख्य परेड शुरू होती है ! इसमें सर्वप्रथम जल, थल और वायुसेना के अधिकारी आगे चलते है जिन्हें परमवीर, अशोक और शौर्य चक्र आदि से सम्मानित किया जाता है ! इसके साथ ही सेना की तीनो टुकडियो के अलावा सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल, भारत तिब्बत सीमा पुलिस बल, ओधोगिक सुरक्षा बल आदि शामिल होते है ! इसमें सेना के बैंड राष्ट्रीय धुन बजाते हुए चलते है ! इसके बाद राज्यों की संस्कृति और उपलब्धि को दिखाती हुई कई प्रकार की रंग-बिरंगी झांकिया आती है ! और अंत में विभिन्न स्कूलों के बच्चे रंग-बिरंगी वेशभूषा में कई प्रकार के करतब दिखाते हुए साथ चलते है.
    राज पथ से निकल कर यह परेड इंडिया गेट होती हुई लाल किले तक जाती है ! किन्तु पिछले कुछ वर्षो से आतंकी गतिविधियों की वजह से इसका मार्ग बदल कर बहादुर शाह जफ़र मार्ग करते हुए लाल किले तक कर दिया गया है ! परेड के अंत मे वायु सेना के विमान आकाश में तिरंगा बनाते हुए विजक चौक के ऊपर से गुजरते है ! कुछ विमान पुष्प वर्षा भी करते है ! इस अवसर पर संसद भवन के साथ ही राष्ट्रीय महत्व के अन्य प्रतीक स्थलों पर विशेष सजावट और रौशनी भी की जाती है ! फिर इसी दिन शाम को देश के राष्ट्रपति द्वारा अपने निवास पर सांसदों, राजनेताओ अन्य देशो से पधारे हुए मेहमान और राजदूतो के साथ स्थानीय गणमान्य नागरिको को सामूहिक भोज भी दिया जाता है.

      Light Festival "Diwali" in Hindi - दीपावली की जानकारी?

      हिन्दू धर्म में लगभग हर रोज कोई न कोई त्यौहार होता है ! इन सब त्योहारों में भी होली, दशहरा और दीपावली मुख्य त्यौहार माने जाते है ! प्रकाश-पर्व अर्थात दीपावली हर वर्ष कार्तिक माह की अमावस्या को मनाया जाता है ! यह जीवन में प्रकाश फ़ैलाने वाला पर्व भी माना गया है ! इस दिन अमावस्या की वह अँधेरी रात दीपक और मोमबत्ती आदि की रोशनी से जगमगा उठती है ! चारो और का सम्पूर्ण द्र्श्य प्रकाशमान हो जाता है ! यह खेतो में खड़ी धान की फसल के भी तैयार होने का समय होता है इसलिए किसान परिवार और व्यापारी वर्ग भी इसका उत्सुकता से इंतज़ार कर रहे होते है.

      दीपावली एक बड़ा त्यौहार है और यही इस पर्व की विशेषता है जो पांच दिन तक चलता है ! इसी वजह से लोगो में लगभग एक सप्ताह तक उमंग और उत्साह बना रहता है ! इसकी शुरुआत धन तेरस नामक पर्व से होती है ! इस दिन घर में कोई न कोई नया बर्तन खरीदने की परंपरा है और इसे शुभ भी माना जाता है ! इसके बाद छोटी दिवाली, फिर मुख्य त्यौहार दिवाली मनाया जाता है ! और इसके अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है ! सबसे अंत में पांचवे दिन भाई-बहिन का त्यौहार भैया-दूज मनाकर त्योहारों की इस लंबी श्रंखला का सुखद समापन होता है.

      अन्य कई पर्व के समान दिवाली का भी धार्मिक और पौराणिक महत्व है ! धन की देवी लक्ष्मी समुद्र-मंथन के चौदह रत्नों में से इसी दिन प्रकट हुई थी ! इसके अलावा जैन सम्प्रदाय के मतानुसार यह महावीर स्वामी का महानिर्वाण दिवस भी है ! भारतीय संस्कृति के आदर्श पुरुष भगवान श्री राम आज ही के दिन लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे थे ! उनकी वापसी पर खुश होकर अयोध्यावासियो ने रौशनी से घर सजाये, बंदनवार बनाये, अपने घरो और महलो का रंग-रोगन आदि किया गया ! अपने प्रिय राजा के वापस राज्य में लोटने की ख़ुशी में रात में दीपो की माला बनाकर भी सजाया तभी से यह दीपावली अर्थात दीपो की अवली का त्यौहार दीप-पर्व बन गया और इसी दिन प्रति वर्ष दीपक जलने की नयी परंपरा का चलन शुरू हो गया जो आज तक अनवरत रूप से जारी है.

      इतिहास की कुछ अन्य घटनाओ पर नजर डाले तो भी दीपावली का दिन विशेष महत्व का लगता है ! सिक्खों के छट्टे गुरु हरगोविंद सिंह आज ही के दिन मुग़ल शासक ओरंगजेब की कैद से मुक्त हुए थे ! उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का आज ही के दिन सिंहासन-अभिषेक हुआ था ! आचार्य विनोबा भावे जो की सर्वोदयी नेता भी कहे जाते है, उन्होंने भी आज ही के दिन अपनी अंतिम श्वास ली ! प्रसिद्ध वेदांती स्वामी रामतीर्थ और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी आज ही के दिन मोक्ष प्राप्त की थी ! इस प्रकार कई महान हस्तियों का दीपावली के इस दिन से विशेष सम्बन्ध है.

      हर किसी को बड़े हर्ष और उल्लास के साथ अपने इस सबसे बड़े त्यौहार के आगमन की प्रतीक्षा होती है ! इस पर्व के आने से महीने भर पहले से ही लोग अपने घरो की साफ़ सफाई और रंग-रोगन आदि करने लगते है ! भिन्न-भिन्न प्रकार की सजावट भी होने लगती है ! दुकानदार अपनी दुकाने सजाने लगते है और व्यापारी लोग नए बही-खाते शुरू होते है ! बाजारों में रंग-बिरंगी पताका लग जाने से माहौल किसी मेले जैसा हो जाता है ! पटाखों की दूकान पर खूब बिक्री और आतिशबाजी होती है ! खील-बताशे और मिठाइयो की अपार बिक्री होती है ! घरो में भी कई प्रकार की मिठाइयाँ और व्यंजन बनाये जाते है.

      संध्या वेला में शुभ मुहूर्त में धन की देवी माँ लक्ष्मी का पूजन किया जाता है ! यह इस त्यौहार का मुख्य दिन भी मन जाता है ! ऐसी मान्यता है की इस रात्रि माता लक्ष्मी का आगमन होता है जिसे सफाई और रौशनी अत्यधिक प्रिय होती है ! इस दिन एकल परिवार भी संयुक्त परिवार बन जाते है और घर के सारे सदस्य इस दिन एक साथ होते है ! इसके बाद लोग एक दुसरे के घरो में जाकर कुशल-क्षेम पूछते है और अन्य बड़ो से आशीर्वाद भी लेते है ! घर-घर में मिठाइयों का आदान-प्रदान होता है.

      सामाजिक परंपरा के साथ ही वैज्ञानिक द्रष्टि से भी इस त्यौहार का अलग ही महत्व है ! गहन साफ़-सफाई और पटाखो की आतिश बाजी से वातावरण में व्याप्त कई प्रकार के कीटाणु समाप्त हो जाते है और समूचा पर्यावरण ही स्वास्थ्यवर्धक हो जाता है.

      कुछ लोग मंगल कामना के इस पर्व पर शराब आदि पीते है और जुआ भी खेलते है जो हमारी सामाजिकता और इस प्रकाश पर्व की नकारात्मक छवि दिखाता है ! आतिश बाजी के लिए छोड़े जाने वाले पटाखों आदि से कई प्रकार की दुर्घटना हो जाने से जन धन की हानि हो जाती है ! ऐसी बुराइयों पर अंकुश लगाने की अत्यधिक आवश्यकता है.

      Short Essay on "Teachers Day" - शिक्षक दिवस की जानकारी?

      हमारी सामाजिक विचारधारा को सही दिशा में क्रियाशील रखने में शिक्षको की अहम भूमिका होती है ! एक शिक्षक न केवल बच्चो को अध्यापन का कार्य करवाता है बल्कि वह देश की भावी नागरिक पीढ़ी को भी तैयार करता है ! शिक्षक राष्ट्र के निर्माण में भागीदार होते है और वे देश की संस्कृति को संरक्षण भी प्रदान करते है ! वे बालको में सुसंस्कार तो डालते ही है साथ ही अज्ञानता रुपी उनका अन्धकार भी दूर करते है ! शिक्षको के इन विशेष कार्यो और अहम भूमिका निभाने के सम्बन्ध में सम्मानित करने का जो जो दिन है उसे ही शिक्षक दिवस कहा जाता है ! हर वर्ष 5 सितम्बर को यह सभी विधालयो और विश्वविधालयो में बहुत ही उत्साह से मनाया जाता है.

      डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जो की भारत के प्रथम राष्ट्रपति होने के साथ ही एक अच्छे शिक्षक भी थे ! इनके जन्म दिवस पर कई सालो से शिक्षक दिवस मनाया जाता है ! वे संस्कृत के अच्छे शास्त्री, महान शिक्षक और दार्शनिक व्यक्ति थे ! कलकत्ता के दर्शन शास्त्र विश्वविधालय में किंग जोर्ज पंचम के पद पर भी वे लगभग 1 वर्ष तक रहे थे ! लगभग 9 वर्ष तक वह काशी के हिन्दू विश्वविधालय के उप कुलपति रहे और इसी पद पर रहते हुए उन्होंने शिक्षको के लिए सम्मान करने के लिए एक विशेष दिन का विचार रखा ! उनके जीवन का अधिकतम समय भी एक शिक्षक के रूप में व्यतीत हुआ था.

      आज भी स्कूल और कॉलेज में शिक्षको के मूल्यांकन और सम्मान के लिए यह एक महत्वपूर्ण दिन है ! इस दिन कई विधालयो में शिक्षण का कार्य छात्र ही देखते है और छात्र-छात्राओ के प्रति विशेष लगाव रखने वाले शिक्षको को इस दिन सम्मानित किया जाता है ! सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन को याद करते हुए उनके विचार रखे जाते है ! विधार्थियों के माध्यम से भी यथाशक्ति अपने शिक्षको को उपहार आदि दिए जाते है ! ज्ञानवर्धक प्रतियोगिताये रखी जाती है ! जीवन में शिक्षक का महत्व बताया जाता है.

      शिक्षक ज्ञान की वह ज्योति है जो अन्धकार युक्त कोमल बाल मन को आलोकित कर देती है ! अध्यापक देश के बालको को साक्षर बनाने का काम तो करते ही है साथ ही विवेक का ज्ञान देकर उनका तीसरा नेत्र भी खोलते है जिससे वे बड़े होकर सही-गलत की परख कर सके और अपने निर्णय स्वयं ले सके ! इस तरह शिक्षक किसी भी देश के पूर्ण समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त करते है.

      अध्यापक की महत्ता बताते हुए महर्षि अरविन्द अपनी एक पुस्तक में लिखते है की –‘ शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के उपवन के माली है वे इसमें संस्कारों की खाद देते है, अपने श्रम से सींच-सींच कर महाप्राण शक्ति बनाते है ! इटली के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार ने कहा है की शिक्षक वह मोमबत्ती है जो स्वयं जलकर दुसरो को प्रकाश देती है ! संत कबीर ने तो शिक्षक को ईश्वर से भी ऊपर दर्जा देते हुए कहा है की-

      ‘गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागू पाय !
      बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय !!

      भारतीय संस्कृति में तो गुरु से आशीर्वाद लेने की अत्यंत ही प्राचीन परम्परा रही है ! अर्जुन –एकलव्य जैसे अनगिनत शिष्यों से हिंदी साहित्य का इतिहास भरा पड़ा है ! ब्रहस्पति को देवगुरु माना गया है ! गुरुकुल में अध्यन-अध्यापन की व्यवस्था आर्य कालीन सभ्यता से ही प्रचलित है ! प्राचीन काल से ही गुरु-शिष्य परंपरा को महत्व देते हुए हर वर्ष आषाड़ माह की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा की विशेष उपमा दी गयी है ! इस दिन गुरु की पूजा और सम्मान को विशेष महत्व दिया गया है.

      इस प्रकार शिक्षक को आदर और सम्मान देना और उसकी कीर्ति का प्रचार –प्रसार करना हमारे देश की केंद्र और राज्य सरकार दोनों का ही मुख्य दायित्व होना चाहिए और शिक्षक दिवस इस दायित्व को पूरा करने का अच्छा दिवस है ! इस दिन स्कूल कोलेज के अलावा सरकार की तरफ से भी बड़े-बड़े आयोजन किये जाते है ! साहित्य की द्रष्टि से श्रेष्ठ शिक्षको को चयनित करके सम्मानित किया जाता है ! समय-समय पर भाषा और साहित्य के उत्सवों का आयोजन किया जाता है.

      देश की राजधानी दिल्ली में भी केंद्र सरकार द्वारा और दिल्ली नगर निगम, दिल्ली नगर पालिका आदि द्वारा अपने-अपने क्षेत्रो के अधीन आने वाले स्कूलों में उनके श्रेष्ठ अध्यापकों का चयन और सम्मान भी किया जाता है ! और राज्य सरकारे भी अपने स्तर पर समय-समय पर कई शैक्षिक सम्मलेन आदि के माध्यम से शिक्षको और शैक्षणिक विषय पर कई प्रकार के वाद-विवाद प्रतियोगिता आदि का आयोजन कराती है.

      इस प्रकार शिक्षक और शैक्षणिक व्यवस्था का यह क्रम बनाये रखने और शिक्षण के कार्य में और अधिक सार्थकता लाने के लिए शिक्षको का आदर-सम्मान करना, उन्हें समय-समय पर पुरस्कृत करना और उनका उत्साह वर्धन करना अत्यंत ही आवश्यक है और इसी क्रम में शिक्षक दिवस की तभी उपयोगिता भी है.

        Introduction of "HOLI" - रंगों का त्यौहार : होली?

        प्राचीन काल से ही त्यौहार भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े वाहक और संरक्षक भी बने हुए है ! त्यौहार हमारे जीवन की नीरस एकरसता को तोड़कर नयी उमंग और हर्ष का संचार करते है ! हमारे परंपरागत त्योहारों में रंगों का त्यौहार होली भी एक महत्वपूर्ण पर्व माना गया है ! इस त्यौहार में संयोग से मिलाप होने की सम्भावना अन्य पर्व की अपेक्षा अधिक होती है और मिल-जुलकर रंग आदि लगाने से यह हमारी समानता की भावना को भी विस्तार प्रदान करता है और समरसता बढ़ाता है.

        हमारे देश में शायद ही ऐसी कोई तिथि है जो किसी न किसी पर्व से जुडी हुई न हो ! भारत में मनाये जाने वाले हर एक पर्व के पीछे कोई न कोई धार्मिक और सामाजिक मान्यता अवश्य ही जुडी रहती है ! होली का पर्व भी एक पौराणिक कथा से जुडा हुआ है ! ऐसी मान्यता है की हिरनकश्यप नामक राक्षस ने जब भगवान का अस्तित्व ही नकार कर अपनी प्रजा को स्वयं को ही भगवान मानने पर विवश कर दिया तब अपने ही पुत्र प्रहलाद के भगवत मार्गी हो जाने पर उसने उसे मारने के लिए कई असफल प्रयास किये और अंत में आग से न जल पाने का वरदान प्राप्त अपनी बहिन होलिका को अपने पुत्र प्रहलाद को अग्नि में लेकर बैठ जाने का आदेश दिया किन्तु भगवत कृपा से उस दिन होलिका तो जल गयी और प्रहलाद सकुशल बच गया ! तभी से इस दिन यह पर्व बुराई को आग में जला देने की मान्यता के साथ हर वर्ष मनाया जाने लगा जो आज तक अनवरत रूप से जारी है.

        रंगों का यह त्यौहार अपार हर्ष और प्रसन्नता का पर्व है ! ब्रज क्षेत्र में तो यह त्यौहार एक पखवाड़े तक चलता है ! इससे पूर्व ही मंदिरों में फाग आदि के कार्यक्रम होने लगते है और सारा माहौल ही भक्तिमय हो जाता है ! लोग इस दिन पुराने वैर-भाव भुलाकर एक दुसरे के गले मिलते है और परस्पर रंग-गुलाल आदि लगाते है ! पूर्णिमा को होलिका का दहन सामूहिक रूप से किया जाता है ! इस अवसर पर महिलाए श्रृंगार कर पूजन आदि करती है.

        मुग़ल बादशाहों की महफ़िलो और शायरी में भी होली का वर्णन हुआ है जिससे साफ़ प्रतीत होता है की यह पर्व मुस्लिम भी प्रसन्नता पूर्वक मानते है ! मीर, जफ़र और नजर आदि की शायरी में होली की धूम का विस्तृत उल्लेख हुआ है जो हमारी लोक परंपरा और सोहार्द का प्रतीक है ! जहाँगीर ने अपने रोजनामचे तुजुक-ए-जहाँगीरी में लिखा की हिंदी संवत्सर के अंत में यह त्यौहार आता है और इस दिन शाम को आग जलाकर दुसरे दिन उसकी राख आदि एक-दुसरे पर मलते है ! अल-बरुनी ने भी अपनी ग्यारहवी सदी की यात्रा में तात्कालिक होली का वर्णन बहुत ही सम्मान के साथ किया है और लिखा है की अन्य दिनों की अपेक्षा इस दिन विशेष पकवान बनते है और ब्राह्मणों को देने के बाद इनका आदान-प्रदान भी होता है ! मुगलों के अंतिम बादशाह अकबर शाह सानी और बहादुरशाह जफ़र तो खुले दरबार में होली खेलने के लिए अत्यंत प्रसिद्ध थे.

        इस पर्व को ऋतुओ से सम्बन्धित भी बताया गया है क्योंकि इन दिनों में मौसम भी सर्दी से गर्मी की और करवट लेने लगता है साथ ही किसानो की मेहनत से तैयार की गयी खेतो में खड़ी फसल भी पक जाती है जिसे देखकर वे ख़ुशी से झूम उठते है ! गेहू की बाली को सामूहिक रूप से होली की आग में भुनकर खाया जाता है और नए अनाज आदि का आदान-प्रदान भी किया जाता है.

        दूसरा दिन धुलंडी का होता है जो एक-दुसरे पर रंग डालकर मनाया जाता है ! इस दिन का विशेषकर बच्चो को बेसब्री से इंतज़ार होता है ! सुबह जल्दी ही हाथो में रंग लिए बच्चो और बड़ो की टोलिया अपना-अपना दल बनाकर गल्ली-मुहल्लों में घुमने लगती है ! एक-दुसरे को गले लगाकर, रंग-गुलाल आदि मलकर होली की बधाई दी जाती है ! रंगों से भरे गुब्बारे और पानी की पिचकारियो से रंग डाला जाता है ! ढोल और चंग बजाये जाते है और लोकगीत गाये जाते है.

        दोपहर तक रंग लगाने का यह कार्यक्रम समाप्त हो जाता है और लोग नहा-धोकर नए कपडे पहन लेते है ! शाम को लोग एक-दुसरे के घर जाते है और बड़ो से आशीष लेते है ! कई जगह इस दिन शाम को मेला आदि लगता है ! कई क्षेत्रो में इस दिन दंगल-प्रतियोगिता, हास्य समेलन, मुर्ख-जुलुस आदि सामाजिक कार्यक्रम भी रखे जाते है.

        होली उत्साह और उमंग का त्यौहार है ! यह हमारे सामाजिक सोहार्द का उत्तम पर्व है किन्तु कुछ लोग इस दिन मदिरा आदि का सेवन कर आपस में ही विवाद कर बैठते है जो हमारे भाईचारे और ज़ीयों और जीने दो के मूल मंत्र पर कलंक के सामान है और इस त्यौहार की गरिमा तथा मूल भावना को ठेस पहुचता है.

        What is illiteracy in hindi - निरक्षरता की जानकारी

        साक्षरता जीवन की पूर्णता, सम्पन्नता और सक्षमता का प्रमाण है ! जीवन को जीने के लिए आवश्यक प्राथमिक शिक्षा की प्राप्ति ही साक्षरता कहलाती है और इसका अभाव ही निरक्षरता ! आजादी के इतने वर्ष बाद भी आज देश के दूर-दराज के दुर्गम- ग्रामीण क्षेत्रो में साक्षरता की स्थिति चिंताजनक है ! किसी भी परिस्थिति या कारणवश व्यक्ति का शिक्षा से वंचित रह जाना या उसे यह प्राथमिक शिक्षा का अवसर प्राप्त ही नहीं हो पाना निरक्षरता के ही दायरे में आता है.

        बढती जनसंख्या, बेरोजगारी, आर्थिक संसाधनों में लगातार आती कमी, लड़का-लड़की में किया गया भेदभाव और महंगाई आदि मुख्य समस्याओं से इसमें लगातार इजाफा होता आया है ! ग्रामीण क्षेत्रो में सुविधाओं की कमी से इसका आकार दिनों दिन बढ़ रहा है ! विधालयो, शिक्षको और यातायात के साधनों की कमी, अनिश्चित विधुत-आपूर्ति, सडको की कमी, जन-चेतना और जाग्रति में कमी आदि से देश के गाँवों में आज भी यह समस्या एक मुख्य चुनौती के रूप में बनी हुई है.

        निरक्षरता के कारण:-

        एक सर्वे के अनुसार आज भी देश के चार करोड़ बच्चो ने विधालय का मुह तक नहीं देखा है ! गरीब परिवारों की कई लडकियों का स्कूल जाना एक सपना ही है ! स्त्री शिक्षा का स्तर तो देशभर में चिंताजनक है ! आज भी गाँव के सरकारी विधालयो का स्तर यह है की किसी में पढने को कमरे और शौचालय नहीं है, कही अध्यापक नहीं है और ये सब है तो वह पहुचने को सड़क और साधनों की कमी है ! देश के कई क्षेत्रो में महिला अध्यापको की कमी है इस वजह से अधिक उम्र की लडकियों को अभिभावक विधालय भेजने से कतराते है ! कई बार परिवार की आर्थिक स्थिती ख़राब होने से उनसे घर के काम में मदद ली जाती है जिनसे उनकी पढ़ाई बीच में ही छुट जाती है ! बाल-विवाह जैसी कुरीति भी निरक्षरता को बढ़ावा देती है ! आज भी घर-परिवार में काम का बोझ लडको के मुकाबले लडकियों पर अधिक है ! गाँवों में पांच से सात वर्ष की होने पर ही इनसे काम लिया जाने लगता है और इसे माता-पिता के काम में हाथ-बंटाने की संज्ञा दे दी जाती है ! विधालयो में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षक के सैंकड़ो पद कई सालो तक खाली पड़े रहते है, और यदि यह पद भर भी जाये तो फिर शिक्षक ग्रामीण क्षेत्रो में शिक्षण कराने में रूचि ही नहीं लेते है ! आज भी कई विधालयो में पुस्तकालय और खेल के मैदान की कमी है ! निशुल्क स्तर पर गणवेश और पुस्तके देने के बावजूद लोग सुविधाओं के अभाव में सरकारी की अपेक्षा निजी विधालय को प्राथमिकता देते है जिससे गरीब व्यक्ति उस स्तर तक पैसा खर्च नहीं कर पाता और उसके बच्चो को शिक्षा से वंचित रहना पड़ता है ! जिसके फलस्वरूप प्रवेश के आंकड़े कम होने से वह विधालय समायोजित कर दिया जाता है.

        निरक्षरता के प्रभाव:-

        इस प्रकार मनुष्य के सर्वांगीण विकास में शिक्षा का अधिक महत्व है क्योंकि यही उसे सामाजिक और आर्थिक जीवन-जीने का सामर्थ्य प्रदान करती है और व्यक्ति के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाती है ! इससे मानव का बोद्धिक और मनोवैज्ञानिक स्तर भी बढ़ता है ! शिक्षा के अभाव में बचपन में बच्चो के कोमल मस्तिष्क का मानसिक विकाश नहीं हो पाता और यह कमी बड़े होने पर उनके चरित्र में यथास्थिति रह जाती है ! अशिक्षित व्यक्ति सही गलत की परख अपने विवेक से नहीं पर पाता और उसे अपने निर्णय लेने में भी परेशानी होती है ! शिक्षा की यह कमी उसे रोजगार से लेकर जीवन पर्यंत उसके सामाजिक जीवन में खलती रहती है ! परिस्थिति चाहे जो भी रही हो किन्तु उम्र का यह स्तर पार कर लेने के बाद उसे शिक्षा पाने का यह अवसर जीवन में दोबारा से मिल ही नहीं पता और वह घर –परिवार और समाज की जिम्मेदारियों के तले दब सा जाता है ! आधुनिक युग में अशिक्षित व्यक्ति को शिक्षा की कमी अधिक खलती है और जीवन के हर स्तर पर वह इसकी आवश्यकता को महसूस करता है ! महिला-सशक्तिकरण में शिक्षा अत्यंत आवश्यक है बिना शिक्षा के सरकारी साक्षरता के कार्यक्रमों की कोई उपयोगिता ही नहीं रह जाती है ! सरकार की बालिका कल्याण की योजनाओ का कोई ओचित्य नहीं है.

        उपसंहार:-

        शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारने और निरक्षरता को जड़ से मिटाने के लिए सरकार को और समाज को मिलकर काम करना होगा तभी यह गंभीर समस्या नियंत्रित हो सकती है ! सरकार को उच्च स्तर में बालिका शिक्षा निशुल्क करने, साईकिल और लैपटॉप का वितरण करने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा की पहले प्राथमिक स्तर की शिक्षा पाना और उनका विधालय जाना संभव हो सके ! आज भी सरकार की और से सकल उत्पाद का सिर्फ छह प्रतिशत ही शिक्षा पर खर्च होता है ! इस प्रकार प्राथमिक शिक्षा तो हमारे जीवन की बुनियाद और जीवन की मूलभूत आवश्यकता है.

        जल संकट पर निबंध - (Water problem and solution) in hindi?

        पेयजल की समस्या इक्कीसवी सदी की सर्वाधिक गम्भीर समस्याओ में से एक है ! आज दुनिया भर की अठारह प्रतिशत आबादी को पीने योग्य शुद्ध जल उपलब्ध नहीं है ! एक अनुमान के अनुसार लगभग बाईस लाख लोग तो हर साल साफ़ जल नहीं मिलने की वजह से होने वाली घातक बीमारियों से मर जाते है ! स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करके ऐसी अकाल मौतों को कुछ हद तक कम किया जा सकता है ! विकाशशील देशो में कई जगह तो स्थिती इतनी विकट है की महिलाये छह किलोमीटर तक पैदल चलकर पीने योग्य जल की व्यवस्था करती है ! स्वच्छ जल का लगभग आधा भाग कई प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारणों से प्रदूषित हो ही जाता है या फिर उचित संग्रह के अभाव में वह व्यर्थ ही बह जाता है ! राजनितिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में भी जल की स्वच्छता को लेकर विशेष प्रयास होते दिखाई नहीं दे रहे है.

        पेयजल की आवश्यकता:-

        जल ही जीवन की पराकाष्टा है और जल के बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है ! शरीर को स्वच्छ जल की उतनी ही आवश्यकता है जितनी प्राणवायु ऑक्सिजन और भोजन की होती है ! इसके अलावा भी क्रषि जैसे आधारभूत रोजगार के लिए विश्व भर में लगभग सत्तर प्रतिशत ताजा जल का उपयोग होता है ! वन्य जीव से लेकर वनस्पति तक जल सबकी परम आवश्यकता है ! भारत में केवल 42 प्रतिशत लोगो को ही शुद्ध पेयजल उपलब्ध हो पाता है ! शिशु म्रत्यु दर को बढाने में भी अशुद्ध जल की ही मुख्य भूमिका होती है ! इस प्रकार पानी की गुणवत्ता के आधार पर भारत का विश्व भर में बारहवा स्थान है ! आज भी विश्व के लगभग तीस प्रतिशत देश साफ़ पानी की कमी से जूझ रहे है ! वैज्ञानिको के अनुसार विश्व भर की लगभग दो तिहाई आबादी 2020 तक पिने योग्य पानी की भयंकर कमी वाले क्षेत्रो में रहने को मजबूर हो जायेगी और इसका विकल्प तलाशना भी आसान नहीं होगा.

        पेयजल-प्रदूषण के कारण और निवारण:-

        उचित सफाई व्यवस्था जल को प्रदूषित होने से बचाने का सबसे सरल तरीका है ! विश्व भर में सतह के लगभग सत्तर प्रतिशत भाग पर जल है किन्तु पीने योग्य जल तो सिर्फ 2.5 प्रतिशत ही है और इस स्वच्छ जल का भी दो तिहाई भाग बर्फ़ के रूप में ग्ल्येशियर में जमा पड़ा है ! इस प्रकार धरती पर पीने योग्य सुलभ जल तो मात्र 1 प्रतिशत ही आसानी से उपलब्ध है और उसका आधा भाग हमारे दुरूपयोग की बलि चढ़ रहा है ! आज उद्योगों से निकलने वाले विषैले रसायन जल को अशुद्ध बना रहे है और उसमे लगातार जहर घोलकर बिमारियों को जन्म दे रहे है ! कई प्रकार की गन्दी नालिया और संक्रमित जल का एक बड़ा हिस्सा रोज इनके माध्यम से तालाब और नदी जैसे जलस्त्रोत में मिल रहा हैं इससे जलीय जीव भी अकाल मौत मर रहे है और समुद्री क्षेत्रो में इनका खादान्न के रूप में प्रयोग किया जाना कई प्रकार की घातक बिमारियों को साक्षात् आमंत्रण है ! जलवायु परिवर्तन से प्राक्रतिक जल स्त्रोत तेजी से कम हो रहे है ! इससे पर्यावरण और स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरे भी उत्पन्न हो रहे है ! दूषित जल से सब्जी और अनाज के रूप में जहरीले तत्व हमारे शरीर में जाकर हमारा स्वास्थ्य ख़राब कर रहे है ! आज एशिया में बहने वाली नदियों में घरेलु कचरे की अधिक मात्रा होने से विश्व भर की अन्य नदियों की अपेक्षा शीशे की मात्र बीस गुना बढ़ गयी है ! संयुक्त राष्ट्र संघ की जल विकाश रिपोर्ट में भी भारत को प्रदूषित जल की आपूर्ति वाला देश बताया गया है ! हमारी त्रुटिपूर्ण सिचाई व्यवस्था से जल का उचित उपभोग नहीं हो पाता और 60 प्रतिशत तो वह भाप के रूप में उड़कर वापस समुद्र में चला जाता है ! अधिक मात्रा में अवांछित जल भर जाने से कृषि योग्य भूमि भी दलदल युक्त निम्न स्तर की हो जाती है.

        उपसंहार:-

        जनसंख्या के लगातार बढ़ने से और वायुमंडल में तेजी से आ रहे बदलावों के फलस्वरूप आज प्रथ्वी के मीठे पानी के मुख्य जल स्त्रोत सूखने की कगार पर है ! ओधोगिक ईकाईयों में क्लोरिन, अमोनीया जैसे हानिकारक तत्व लगातार घुल रहे है ! ये जल के माध्यम से हमारे शरीर में जाकर श्वसन, चर्म और रक्तचाप सम्बन्धी बीमारी को बढ़ावा दे रहे है ! इसके लिए सूखे और गिले कचरे का उचित निस्तारण किया जाना, हानिकारक रसायनों पर रोक लगाकर उनका अन्य विकल्प तलाशना, स्वच्छ जल का आवश्यकतानुसार उचित प्रयोग किया जाना अत्यंत जरूरी है ! साथ ही वर्षा के साफ़ जल का पर्याप्त संग्रह, सघन वृक्षारोपण और प्लास्टिक आदि हानिकारक पदार्थो पर तुरंत प्रभावी ढंग से लगाईं गयी रोक इस दिशा में कारगर सिद्ध होंगी अन्यथा पीने योग्य जल को लेकर विश्ब भर में यही स्थिती बनी रहेगी और इस दिशा में प्रयास नहीं किया गया तो यह लगातार और विकराल होती जाएगी.

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